Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 65 / 11

ब्रह्म॒ गामश्वं॑ ज॒नय॑न्त॒ ओष॑धी॒र्वन॒स्पती॑न्पृथि॒वीं पर्व॑ताँ अ॒पः । सूर्यं॑ दि॒वि रो॒हय॑न्तः सु॒दान॑व॒ आर्या॑ व्र॒ता वि॑सृ॒जन्तो॒ अधि॒ क्षमि॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 65 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : वसुकर्णो वासुक्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : ब्रह्म॑ । गाम् । अश्व॑म् । ज॒नय॑न्तः । ओष॑धीः । वन॒स्पती॑न् । पृ॒थि॒वीम् । पर्व॑तान् । अ॒पः । सूर्य॑ । दि॒वि । रो॒हय॑न्तः । सु॒ऽदान॑वः । आर्या॑ । व्र॒ता । वि॒ऽसृ॒जन्तः॑ । अधि॑ । क्षमि॑ ॥ १०.६५.११

पदार्थ : (सुदानवः) कल्याण देनेवाली सूर्यकिरणें (ब्रह्म) अन्न को (गाम्-अश्वम्) गौ और अश्व को (ओषधीः-वनस्पतीन्) हरी ओषधियों, फलवाले वृक्षों को (पृथिवीं पर्वतान्-अपः) परिष्कृत भूमि, पर्वतों और जलों को (जनयन्तः) उत्तमरूप में सम्पन्न करती हुईं (दिवि सूर्यं रोहयन्तः) तथा द्युलोक में सूर्य को ऊपर प्रकाशित करती हुईं (अधि क्षमि) पृथिवी पर (आर्या व्रता विसृजन्तः) श्रेष्ठ कर्मों को प्रकाशित करती हुईं दृष्टि पथ में आती हैं, वे सेवन करने योग्य हैं ॥११॥

भावार्थ : सूर्य की किरणें कल्याण का प्रसार करनेवाली हैं। उनके द्वारा  पृथिवी में पौष्टिक शक्ति तथा अन्न की उत्पत्ति, गौ अश्व आदि प्राणियों में उपयोगी बल और कार्यशक्ति आती है। साधारण ओषधियाँ और फलवाले वृक्ष भी इनसे बल पाते हैं। सूर्य को आकाश में चमकाती हैं। रोगनिवृत्ति आदि श्रेष्ठ कर्मों में इनका प्रभावशाली उपयोग होता है ॥११॥