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Rigveda / 10 / 128 / 3

मयि॑ दे॒वा द्रवि॑ण॒मा य॑जन्तां॒ मय्या॒शीर॑स्तु॒ मयि॑ दे॒वहू॑तिः । दैव्या॒ होता॑रो वनुषन्त॒ पूर्वेऽरि॑ष्टाः स्याम त॒न्वा॑ सु॒वीरा॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 128 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : विहव्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : मयि॑ । दे॒वाः । द्रवि॑णम् । आ । य॒ज॒न्ता॒म् । मयि॑ । आ॒ऽशीः । अ॒स्तु॒ । मयि॑ । दे॒वऽहू॑तिः । दैव्याः॑ । होता॑रः । व॒नु॒ष॒न्त॒ । पूर्वे॑ । अरि॑ष्टाः । स्या॒म । त॒न्वा॑ । सु॒ऽवीराः॑ ॥ १०.१२८.३

पदार्थ : (देवाः) यज्ञ में आये हुए विद्वान् जन (मयि) मेरे-निमित्त (द्रविणम्) ज्ञानधन को (आ यजन्ताम्) भलीभाँति प्राप्त करावें (मयि) मेरे निमित्त (आशीः) कामपूर्ति (अस्तु) हो (मयि) मेरे निमित्त (देवहूतिः) देवों का सत्कार फल हो (पूर्वे दैव्याः-होतारः) श्रेष्ठ, परमात्मदेवसम्बन्धी उपदेश देनेवाले अध्यात्मयज्ञ के साधक (वनुषन्त) मुझे सम्भागी बनावें-स्वीकार करें (तन्वा-अरिष्टाः) यज्ञसेवन द्वारा शरीर से दुःखतापरहित (सुवीराः) सुष्ठु प्राणवाले (स्याम) होवें ॥३॥

भावार्थ : यज्ञ में आये विद्वान् के द्वारा ज्ञान धन को प्राप्त करना चाहिये और अपनी कामनाओं की पूर्ति के साधन जानना चाहिये, परमात्मसम्बन्धी उपदेश के अपने को भागी बनावें तथा शरीर से स्वस्थ अच्छे प्राणवाले यज्ञ के सेवन से होना चाहिये ॥३॥