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Rigveda / 10 / 128 / 4

मह्यं॑ यजन्तु॒ मम॒ यानि॑ ह॒व्याकू॑तिः स॒त्या मन॑सो मे अस्तु । एनो॒ मा नि गां॑ कत॒मच्च॒नाहं विश्वे॑ देवासो॒ अधि॑ वोचता नः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 128 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : विहव्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : मह्य॑म् । य॒ज॒न्तु॒ । मम॑ । यानि॑ । ह॒व्या । आऽकू॑तिः । स॒त्या । मन॑सः । मे॒ । अ॒स्तु॒ । एनः॑ । मा । नि । गा॒म् । क॒त॒मत् । च॒न । अ॒हम् । विश्वे॑ । दे॒वा॒सः॒ । अधि॑ । वो॒च॒त॒ । नः॒ ॥ १०.१२८.४

पदार्थ : (मम) मेरी (यानि) जो (हव्या) ग्राह्य-ग्रहण करने योग्य वस्तुएँ (मह्यम्) मेरे लिये श्रेष्ठता से (यजन्त) सङ्गत हों-प्राप्त हों (मे) मेरे (मनसः) मन की (आकूतिः) सङ्कल्पधारा (सत्या-अस्तु) यथार्थ या सफल हो (एनः कतमत्-चन) पाप को कदापि (मा निगाम्) मत प्राप्त होऊँ (विश्वे देवासः) सब विद्वान् (नः) हमें मुझे (अधि वोचत) अपने अधीन उपदेश करें ॥४॥

भावार्थ : मानव के पास जितनी वस्तुएँ हों, आवश्यक हों, अनावश्यक संग्रह न हो, सङ्कल्पधारा यथार्थ सफलवाली अयथार्थ निष्फल न उठे, पाप को कभी न करे, विद्वानों से उपदेश सुनते रहना चाहिये ॥४॥