Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 14 / 2

अया॑मि ते॒ नम॑उक्तिं जुषस्व॒ ऋता॑व॒स्तुभ्यं॒ चेत॑ते सहस्वः। वि॒द्वाँ आ व॑क्षि वि॒दुषो॒ नि ष॑त्सि॒ मध्य॒ आ ब॒र्हिरू॒तये॑ यजत्र॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 14 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : ऋषभो वैश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब पढ़ने-पढ़ाने रूप विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अया॑मि। ते॒। नमः॑ऽउक्ति॑म्। जु॒ष॒स्व॒। ऋत॑ऽवः। तुभ्य॑म्। चेत॑ते। स॒ह॒स्वः॒। वि॒द्वान्। आ। व॒क्षि॒। वि॒दुषः॑। नि। ष॒त्सि॒। मध्ये॑। आ। ब॒र्हिः। ऊ॒तये॑। य॒ज॒त्र॒॥

पदार्थ : हे (ऋतावः) सत्यप्रकाशकशील ! मैं (ते) आपके (नमउक्तिम्) नमस्कारों के वचन को (अयामि) प्राप्त होता हूँ (जुषस्व) उसका आप आदरसहित ग्रहण कीजिये। हे (सहस्वः) अतिबलयुक्त वा संपूर्ण विद्या जाननेवाले जो (विद्वान्) विद्वान् ! आप (विदुषः) विद्वानों को (आ) (वक्षि) सबप्रकार उपदेश देते हो, ऐसे आपके साथ विद्वानों को प्राप्त होता हूँ। हे (यजत्र) पूजन करने योग्य ! जो आप (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (बर्हिः) अन्तरिक्ष के (मध्ये) मध्य में (आ) (नि) अच्छे प्रकार निश्चित (सत्सि) विराजो उस (चेतते) बोध देनेवाले (तुभ्यम्) आपके लिये नमस्काररूप वचन करता हूँ ॥२॥

भावार्थ : जैसे विद्यार्थी लोग नमस्कार आदि सेवा से अध्यापकों को प्रसन्न करें, वैसे अध्यापक लोग उत्तमशिक्षारूप विद्यादान से विद्यार्थियों को प्रसन्न सन्तुष्ट करें ॥२॥