Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 14 / 3

द्रव॑तां त उ॒षसा॑ वा॒जय॑न्ती॒ अग्ने॒ वात॑स्य प॒थ्या॑भि॒रच्छ॑। यत्सी॑म॒ञ्जन्ति॑ पू॒र्व्यं ह॒र्विर्भि॒रा ब॒न्धुरे॑व तस्थतुर्दुरो॒णे॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 14 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : ऋषभो वैश्वामित्रः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : मनुष्यों को नियम का आश्रय करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : द्रव॑ताम्। ते॒। उ॒षसा॑। वा॒जय॑न्ती॒ इति॑। अ॒ग्ने॒। वात॑स्य। प॒थ्या॑भिः। अच्छ॑। यत्। सी॒म्। अ॒ञ्जन्ति॑। पू॒र्व्यम्। ह॒विःऽभिः॑। आ। ब॒न्धुरा॑ऽइव। त॒स्थ॒तुः॒। दु॒रो॒णे॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रकाशयुक्त विद्वान् पुरुष ! (ते) आपके लिये जैसे (वाजयन्ती) बोध कराती हुई (उषसा) प्रातःकाल सन्ध्याकाल दोनों वेला (द्रवताम्) प्रवाह से चलें वा (वातस्य) वायु के (पथ्याभिः) मार्ग में उत्तम गमनों से (दुरोणे) गृह में (अच्छ) उत्तम प्रकार (तस्थतुः) वर्त्तमान होवें (बन्धुरेव) बन्धनों के सदृश कारीगर लोग (हविर्भिः) ग्रहण करने योग्य साधनों से (यत्) जिस (पूर्व्यम्) प्राचीन लोगों से रचे गये वाहन विशेष को (सीम्) (आ, अञ्जन्ति) सब प्रकार प्रकट करते हैं, उन दोनों सायंप्रातः वेला की आप यथायोग्य सेवा करें और उस वाहन को सिद्ध करो ॥३॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे ईश्वर से नियत की सन्ध्या और प्रातःसमय की वेला नियम से वर्त्तमान हैं और जैसे चतुर कारीगरों के बनाये गये कलायन्त्रों से युक्त वाहन नियमसहित जाते आते हैं, वैसे ही अपने आप नियमपूर्वक वर्ताव करके नियत यानों को रचके अपनी इच्छानुकूल व्यवहार को उत्तम प्रकार सिद्ध करें ॥३॥