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Rigveda / 3 / 31 / 3

अ॒ग्निर्ज॑ज्ञे जु॒ह्वा॒३॒॑ रेज॑मानो म॒हस्पु॒त्राँ अ॑रु॒षस्य॑ प्र॒यक्षे॑। म॒हान्गर्भो॒ मह्या जा॒तमे॑षां म॒ही प्र॒वृद्धर्य॑श्वस्य य॒ज्ञैः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 31 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒ग्निः। ज॒ज्ञे॒। जु॒ह्वा॑। रेज॑मानः। म॒हः। पु॒त्रान्। अ॒रु॒षस्य॑। प्र॒ऽयक्षे॑। म॒हान्। गर्भः॑। महि॑। आ। जा॒तम्। ए॒षा॒म्। म॒ही। प्र॒ऽवृत्। हरि॑ऽअश्वस्य। य॒ज्ञैः॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे इन्धन और (जुह्वा) साधन और उपसाधनों से युक्त क्रिया से (अग्निः) अग्नि (जज्ञे) उत्पन्न होता है वैसे (रेजमानः) कंपता हुआ (महान्) बड़े उत्तम गुणों से युक्त (गर्भः) स्तुति करने योग्य पदार्थ उत्पन्न होता है और (अरुषस्य) नहीं हिंसा करनेवाले के (महः) श्रेष्ठ (पुत्रान्) सन्तानों के (प्रयक्षे) अत्यन्त यजन अर्थात् संगम करने को उत्पन्न होता है (प्रवृत्) प्रवृत्त होनेवाला (हर्यश्वस्य) जिसके हरणशील घोड़े उसके (यज्ञैः) योग्य कर्मों से (मही) श्रेष्ठ वाणी उत्पन्न होती है (एषाम्) इन सबों के (महि) बड़े (आ, जातम्) अच्छे प्रकार उत्पन्न कर्म को तुम जानो ॥३॥

भावार्थ : जैसे शमी नामक काष्ठ के मध्य से अग्नि प्रकट होकर बड़े-बड़े कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही सुपात्र पुत्र सम्पूर्ण उत्तमकर्मों को करते हैं, इससे ब्रह्मचर्य्य आदि संस्कारों के ही द्वारा सन्तानों को श्रेष्ठ बनाना चाहिये ॥३॥