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Rigveda / 3 / 31 / 4

अ॒भि जैत्री॑रसचन्त स्पृधा॒नं महि॒ ज्योति॒स्तम॑सो॒ निर॑जानन्। तं जा॑न॒तीः प्रत्युदा॑यन्नु॒षासः॒ पति॒र्गवा॑मभव॒देक॒ इन्द्रः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 31 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर सूर्यरूप अग्नि कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒भि। जैत्रीः॑। अ॒स॒च॒न्त॒। स्पृ॒धा॒नम्। महि॑। ज्योतिः॑। तम॑सः। निः। अ॒जा॒न॒न्। तम्। जा॒न॒तीः। प्रति॑। उत्। आ॒य॒न्। उ॒षसः॑। पतिः॑। गवा॑म्। अ॒भ॒व॒त्। एकः॑। इन्द्रः॑॥

पदार्थ : जो (जैत्रीः) जीतनेवाले (अभि) सन्मुख (असचन्त) अनुसार चलते हैं (तमसः) अन्धकार के (महि) बड़े (ज्योतिः) प्रकाशरूप (स्पृधानम्) पदार्थों के साथ किरणों के संघर्ष करनेवाले सूर्य को (निः) निरन्तर (अजानन्) जानें (तम्) उसको (जानतीः) जाननेवाली (उषासः) प्रातःकाल की वेलाओं के तुल्य (प्रति) (उत्) (आयन्) उद्योग करें वा प्राप्त हों जो (एकः) सहायरहित (इन्द्रः) सूर्य्य (गवाम्) किरणों का (पतिः) स्वामी (अभवत्) होवे उसके अनुसार चलते हैं ॥४॥

भावार्थ : जैसे अन्धकार से ज्योति पृथक् होकर अन्धकार को दूर करती है, वैसे ही अविद्या से पृथक् हुई विद्या अविद्या का नाश करती है और जैसे एक सूर्य्य संपूर्ण किरणों का एक साथ ही पालन करता है, वैसे ही समभाव का आश्रय करके राजा प्रजाओं का पालन करे ॥४॥