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Rigveda / 3 / 34 / 6

म॒हो म॒हानि॑ पनयन्त्य॒स्येन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ सुकृ॑ता पु॒रूणि॑। वृ॒जने॑न वृजि॒नान्त्सं पि॑पेष मा॒याभि॒र्दस्यूँ॑र॒भिभू॑त्योजाः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 34 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर राजा तथा प्रजाजनों के कर्त्तव्य विषय को कहते हैं।

पदपाठ : म॒हः। म॒हानि॑। प॒न॒य॒न्ति॒। अ॒स्य॒। इन्द्र॑स्य। कर्म॑। सुऽकृ॑ता। पु॒रूणि॑। वृ॒जने॑न। वृ॒जि॒नान्। सम्। पि॒पे॒ष॒। मा॒याभिः॑। दस्यू॑न्। अ॒भिभू॑तिऽओजाः॥

पदार्थ : जो (अभिभूत्योजाः) शत्रुपराजय करनेवाले बल से युक्त राजपुरुष (वृजनेन) बल और (मायाभिः) बुद्धियों से (वृजिनान्) पापी (दस्यून्) साहसी चोरों को (सम्) (पिपेष) पीसै और जो (अस्य) इस (महः) श्रेष्ठ (इन्द्रस्य) सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त पुरुष के (पुरूणि) बहुत (महानि) बड़े (सुकृता) उत्तम धर्म के योग से किये गये (कर्म) कार्य्यों की (पनयन्ति) प्रशंसा करते हैं, उनका ग्रहण करै, वही पुरुष राजा का मन्त्री होने योग्य होवे ॥६॥

भावार्थ : जैसे राजा और प्रजाजनों को सब लोगों के स्वामी के धर्मयुक्त कर्म स्वीकार करने योग्य हैं, वैसे ही सबके स्वामी राजा को चाहिये कि सब लोगों के उत्तम आचरणों का स्वीकार करै और अनिष्ट आचरणों का स्वीकार कोई न करैं ॥६॥