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Rigveda / 3 / 34 / 7

यु॒धेन्द्रो॑ म॒ह्ना वरि॑वश्चकार दे॒वेभ्यः॒ सत्प॑तिश्चर्षणि॒प्राः। वि॒वस्व॑तः॒ सद॑ने अस्य॒ तानि॒ विप्रा॑ उ॒क्थेभिः॑ क॒वयो॑ गृणन्ति॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 34 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वान् तथा राजपुरुष के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : यु॒धा। इन्द्रः॑। म॒ह्ना। वरि॑वः। च॒का॒र॒। दे॒वेभ्यः॑। सत्ऽप॑तिः। च॒र्ष॒णि॒ऽप्राः। वि॒वस्व॑तः। सद॑ने। अ॒स्य॒। तानि॑। विप्राः॑। उ॒क्थेभिः॑। क॒वयः॑। गृ॒ण॒न्ति॒॥

पदार्थ : जो (देवेभ्यः) विद्वानों से शिक्षा पाके (सत्पतिः) श्रेष्ठ पुरुषों का पालन करने (चर्षणिप्राः) मनुष्यों को सत्य विद्या शिक्षा और उत्तम स्वभाव से पूर्ण करनेवाला (इन्द्रः) राज्य के ऐश्वर्य से युक्त (मह्ना) बड़े (युधा) संग्राम से जिन कर्मों का (वरिवः) सेवन (चकार) करै उस (अस्य) इस राजपुरुष के (तानि) उन कर्मों की (विवस्वतः) सूर्य्य के (सदने) मण्डल में (कवयः) विद्यायुक्त (विप्राः) बुद्धिमान् लोग (उक्थेभिः) प्रशंसा के वचनों से (गृणन्ति) स्तुति करते हैं ॥७॥

भावार्थ : उन्हीं लोगों को विद्वान् और धार्मिक जानना चाहिये कि जो राजा आदिकों की झूठी स्तुति को त्याग के धर्मसम्बन्धी कर्मों की प्रशंसा करते हैं और वे ही राजा होने के योग्य हैं कि जो धर्मयुक्त आचरणों को करते हैं ॥७॥