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Rigveda / 3 / 54 / 10

इ॒मं स्तोमं॑ रोदसी॒ प्र ब्र॑वीम्यृदू॒दराः॑ शृणवन्नग्निजि॒ह्वाः। मि॒त्रः स॒म्राजो॒ वरु॑णो॒ युवा॑न आदि॒त्यासः॑ क॒वयः॑ पप्रथा॒नाः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 54 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : इ॒मम्। स्तोम॑म्। रो॒द॒सी॒ इति॑। प्र। ब्र॒वी॒मि॒। ऋ॒दू॒दराः॑। शृ॒ण॒व॒न्। अ॒ग्नि॒ऽजि॒ह्वाः। मि॒त्रः। स॒म्ऽराजः॑। वरु॑णः। युवा॑नः। आ॒दि॒त्यासः॑। क॒वयः॑। प॒प्र॒था॒नाः॥

पदार्थ : जिस (इमम्) इस परमेश्वर (स्तोमम्) प्रशंसा करने योग्य और (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी के सदृश सम्पूर्ण विद्याओं से जानने योग्य प्रकाश और धारण करनेवाले का (मित्रः) सबका मित्र (वरुणः) श्रेष्ठ हम (प्र, ब्रवीमि) उपदेश देते हैं, उसको (ऋदूदराः) सत्य है हृदय में जिनके वे (सम्राजः) अच्छे प्रकार प्रकाशमान (अग्निजिह्वाः) अग्नि के सदृश प्रकाशमान सत्य के उपदेश देनेवाली जिह्वा है जिनकी वे (युवानः) युवा अवस्था को प्राप्त (आदित्यासः) सूर्य के सदृश पूर्ण विद्या से प्रकाशित (कवयः) तीव्र बुद्धि से युक्त (पप्रथानाः) प्रख्यात बुद्धिमान् लोग (शृणवन्) सुनो ॥१०॥

भावार्थ : जैसे चक्रवर्त्ती राजा अपनी आज्ञा से सम्पूर्ण न्याय को प्रकाशित करता है, वैसे ही यथार्थवक्ता विद्वान् लोग अध्यापन और उपदेश से परमेश्वर और उसकी आज्ञा को प्रसिद्ध करते हैं और जो लोग अड़तालीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य करके पूर्णविद्या युक्त हैं, वे ही इसके कहने सुनने निश्चय और अभ्यास करने और प्रत्यक्ष करने को समर्थ होते हैं ॥१०॥