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Rigveda / 3 / 54 / 11

हि॒र॑ण्यपाणिः सवि॒ता सु॑जि॒ह्वस्त्रिरा दि॒वो वि॒दथे॒ पत्य॑मानः। दे॒वेषु॑ च सवितः॒ श्लोक॒मश्रे॒राद॒स्मभ्य॒मा सु॑व स॒र्वता॑तिम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 54 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : हिर॑ण्यऽपाणिः॑। स॒वि॒ता। सु॒ऽजि॒ह्वः। त्रिः। आ। दि॒वः। वि॒दथे॑। पत्य॑मानः। दे॒वेषु॑। च॒। स॒वि॒त॒रिति॑। श्लोक॑म्। अश्रेः॑। आत्। अ॒स्मभ्य॑म्। आ। सु॒व॒। स॒र्वऽता॑तिम्॥

पदार्थ : हे (सवितः) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के दाता (सुजिह्वः) सुन्दर जिह्वायुक्त (पत्यमानः) पति के सदृश आचरण करते हुए ! आप (दिवः) बिजुली आदि के (विदथे) विज्ञान और (देवेषु) पृथिवी आदिकों में (हिरण्यपाणिः) हस्त के सदृश तेज से युक्त (सविता) सूर्य्य के सदृश (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये जिस (सर्वतातिम्) सम्पूर्ण ही (श्लोकम्) वाणि का (अश्रेः) आश्रय करिये उसको (च) और (आत्) अनन्तर (आ) सब ओर से (त्रिः) तीन बार (आ, सुव) उत्पन्न करो ॥११॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य लोकों का अधिष्ठाता है, वैसे ही विद्वान् सबका अध्यक्ष होवे ॥११॥