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Rigveda / 4 / 3 / 4

त्वं चि॑न्नः॒ शम्या॑ अग्ने अ॒स्या ऋ॒तस्य॑ बोध्यृतचित्स्वा॒धीः। क॒दा त॑ उ॒क्था स॑ध॒माद्या॑नि क॒दा भ॑वन्ति स॒ख्या गृ॒हे ते॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 3 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराड्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। चि॒त्। नः॒। शम्यै॑। अ॒ग्ने॒। अ॒स्याः। ऋ॒तस्य॑। बो॒धि॒। ऋ॒त॒ऽचि॒त्। सु॒ऽआ॒धीः। क॒दा। ते॒। उ॒क्था। स॒ध॒ऽमाद्या॑नि। क॒दा। भ॒व॒न्ति॒। स॒ख्या। गृ॒हे। ते॒॥४॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान राजन् (त्वम्) आप (नः) हम लोगों की (अस्याः) इस प्रजा के (ऋतस्य) सत्य के (शम्यै) कर्म्म के लिये (स्वाधीः) उत्तम प्रकार सब प्रकार विचार करने और (ऋतचित्) सत्य का संग्रह करनेवाला [होते हुए] (कदा) कब (बोधि) जानो और (चित्) भी (ते) आपके (गृहे) गृह में (सधमाद्यानि) मेल के स्थानों में श्रेष्ठ और (उक्था) उचित भी (ते) तुम्हारे (सख्या) मित्रों के कर्म्म वा अभिप्राय (कदा) कब (भवन्ति) होते हैं ॥४॥

भावार्थ : हे राजन् ! आप जब प्रजा के सत्य न्याय को करेंगे, तब ही आपकी आज्ञा के अनुकूल वर्त्ताव करके प्रजा एकसम्मति से होंगीं ॥४॥