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Rigveda / 4 / 3 / 5

क॒था ह॒ तद्वरु॑णाय॒ त्वम॑ग्ने क॒था दि॒वे ग॑र्हसे॒ कन्न॒ आगः॑। क॒था मि॒त्राय॑ मी॒ळ्हुषे॑ पृथि॒व्यै ब्रवः॒ कद॑र्य॒म्णे कद्भगा॑य ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 3 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब उपदेशक विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : क॒था। ह॒। तत्। वरु॑णाय। त्वम्। अ॒ग्ने॒। क॒था। दि॒वे। ग॒र्ह॒से॒। कत्। नः॒। आगः॑। क॒था। मि॒त्राय॑। मी॒ळ्हुषे॑। पृ॒थि॒व्यै। ब्रवः॑। कत्। अ॒र्य॒म्णे। कत्। भगा॑य॥५॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान ! (त्वम्) आप (ह) ही (कथा) किस प्रकार (वरुणाय) श्रेष्ठ की (गर्हसे) निन्दा करते हो (कथा) किस प्रकार (दिवे) प्रकाशमान के लिये निन्दा करते हो (नः) हम लोगों के (आगः) अपराध की (कत्) कब निन्दा करते हो (मीळ्हुषे) सुख बढ़ानेवाले (मित्राय) मित्र के लिये (कथा) किस प्रकार निन्दा करते हो (पृथिव्यै) पृथिवी के सदृश वर्त्तमान स्त्री के लिये (तत्) उस वचन को (कत्) कब (ब्रवः) कहो (अर्य्यम्णे) न्यायाधीश के लिये और (भगाय) ऐश्वर्य्य के लिये (कत्) कब कहो ॥५॥

भावार्थ : हे विद्वानो ! जो राजा श्रेष्ठ वा विद्वानों की निन्दा करे, वह आप लोगों से रोकने योग्य है और सब राजकर्मों की सिद्धि के लिये समयव्यवस्था करनी चाहिये और जब-जब जो-जो कर्म करना हो तब-तब वह-वह कर्म करना चाहिये । इस प्रकार राजा को उपदेश करना चाहिये, जब मित्रद्रोह का आचरण करे तभी उसको शिक्षा देनी चाहिये, ऐसा करने पर राजा और प्रजा दोनों की निरन्तर उन्नति होवे ॥५॥