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Rigveda / 4 / 4 / 7

सेद॑ग्ने अस्तु सु॒भगः॑ सु॒दानु॒र्यस्त्वा॒ नित्ये॑न ह॒विषा॒ य उ॒क्थैः। पिप्री॑षति॒ स्व आयु॑षि दुरो॒णे विश्वेद॑स्मै सु॒दिना॒ सास॑दि॒ष्टिः ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 4 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : रक्षोहाऽग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। इत्। अ॒ग्ने॒। अ॒स्तु॒। सु॒ऽभगः॑। सु॒ऽदानुः॑। यः। त्वा॒। नित्ये॑न। ह॒विषा॑। यः। उ॒क्थैः। पिप्री॑षति। स्वे। आयु॑षि। दु॒रो॒णे। विश्वा॑। इत्। अ॒स्मै॒। सु॒ऽदिना॑। सा। अ॒स॒त्। इ॒ष्टिः॥७॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्या से प्रकाशित सभ्यजन ! (यः) जो (सुभगः) प्रशंसनीय ऐश्वर्य्ययुक्त (सुदानुः) उत्तम दान देनेवाला हो (सः, इत्) वही आपका सभासद् (अस्तु) हो (यः) जो (उक्थैः) प्रशंसाओं और (नित्येन) नहीं नाश होनेवाले (हविषा) हवन करने योग्य पदार्थ से (त्वा) आपको (पिप्रीषति) सुशोभित करने की इच्छा करता है (अस्मै) इसके लिये (स्वे) अपने (आयुषि) जीवन और (दुरोणे) गृह में (विश्वा) सम्पूर्ण (सुदिना) सुन्दर दिन हों (सा) वह (इष्टिः) यज्ञ करने की क्रिया दोनों लोकों में सुख देनेवाली (इत्) ही (असत्) होवे ॥७॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो लोग नित्य प्रेम से न्याय और विनय के द्वारा राज्य की उन्नति करते और राजा और प्रजा के उपद्रव के विना मङ्गल समय सदा ही प्राप्त कराते हैं, वे राजगृह में अध्यक्ष हों ॥७॥