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Rigveda / 4 / 4 / 8

अर्चा॑मि ते सुम॒तिं घोष्य॒र्वाक्सं ते॑ वा॒वाता॑ जरतामि॒यं गीः। स्वश्वा॑स्त्वा सु॒रथा॑ मर्जयेमा॒स्मे क्ष॒त्राणि॑ धारये॒रनु॒ द्यून् ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 4 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : रक्षोहाऽग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अर्चा॑मि। ते॒। सु॒ऽम॒तिम्। घोषि॑। अ॒र्वाक्। सम्। ते॒। व॒वाता॑। ज॒र॒ता॒म्। इ॒यम्। गीः। सु॒ऽअश्वाः॑। त्वा॒। सु॒ऽरथाः॑। म॒र्ज॒ये॒म॒। अ॒स्मे इति॑। क्ष॒त्राणि॑। धा॒र॒येः॒। अनु॑। द्यून्॥८॥

पदार्थ : हे राजन् ! मैं (ते) आपके (सुमतिम्) श्रेष्ठ बुद्धिवाले सभासद् का (अर्चामि) सत्कार करता हूँ जिन (त्वा) आपकी (वावाता) दोषों को नाश करने और विद्या को उत्पन्न करनेवाली (इयम्) यह (गीः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी (घोषि) शब्दयुक्त वचन जैसे हों, वैसे (सम्, जरताम्) स्तुति करे उन आपको (स्वश्वाः) उत्तम घोड़े (सुरथाः) श्रेष्ठ रथ और हम लोग (मर्जयेम) शुद्ध करावें। जैसे (ते) आपके धनों को (अनु, द्यून्) अनुदिन प्रतिदिन हम लोग धारण करें, वैसे आप (अर्वाक्) पीछे (अस्मे) हम लोगों के लिये (क्षत्राणि) राज्य में उत्पन्न हुए धनों को (धारयेः) धारण करिये ॥८॥

भावार्थ : जब राजा सभास्थ जनों को पूँछै कि इस अधिकार में कौन पुरुष रखने योग्य है, तब सम्पूर्ण जन धार्मिक योग्य पुरुष के नियत करने में सम्मति देवें। और राजा को भी चाहिये कि योग्य ही पुरुषों को राजकर्म में नियत करे, जिससे कि नित्य प्रशंसा बढ़े ॥८॥