Rigveda / 4 / 32 / 10
प्र ते॑ वोचाम वी॒र्या॒३॒॑ या म॑न्दसा॒न आरु॑जः। पुरो॒ दासी॑र॒भीत्य॑ ॥१०॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 32 | Mantra No : 10
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : indra: | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : pra te vochaama viiryaa3 yaa mandasaana aarujaH. puro daasiirabhiitya .10.
Component Words : pra. te. vochaama. viiryaa. yaaH. mandasaanaH. aa. arujaH. puraH. daasiiH. abhi.aitya .10.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : प्र। ते॒। वो॒चा॒म॒। वी॒र्या॑। याः। म॒न्द॒सा॒नः। आ। अरु॑जः। पुरः॑। दासीः॑। अ॒भि॒ऽइत्य॑ ॥१०॥
पदार्थ : हे राजन् ! (मन्दसानः) कामना करते हुए आप शत्रुओं की (याः) जो (दासीः) सेविकाओं के सदृश (आ, अरुजः) सब प्रकार रोगयुक्त (पुरः) नगरियों को (अभीत्य) सब ओर से प्राप्त होकर जीतते हो उन (ते) आपके (वीर्य्या) बल, पराक्रम से युक्त कर्म्मों का हम लोग (प्र, वोचाम) उपदेश करें ॥१०॥
भावार्थ : जो राजा शत्रुओं का पराजय कर सके, वही राज्य करने को योग्य हो ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : प्र। ते॒। वो॒चा॒म॒। वी॒र्या॑। याः। म॒न्द॒सा॒नः। आ। अरु॑जः। पुरः॑। दासीः॑। अ॒भि॒ऽइत्य॑ ॥१०॥
पदार्थ : (प्र) (ते) तव (वोचाम) उपदिशेम (वीर्या) बलपराक्रमयुक्तानि कर्म्माणि (याः) (मन्दसानः) कामयमानः (आ, अरुजः) समन्ताद्रोगयुक्ताः (पुरः) नगरीः (दासीः) सेविकाः (अभीत्य) अभितः प्राप्य ॥१०॥
अन्वय : हे राजन् ! मन्दसानस्त्वं शत्रूणां या दासीरिवारुजः पुरोऽभीत्य विजयसे तस्य ते वीर्या वयं प्रवोचाम ॥१०॥
भावार्थ : यो राजा शत्रूणां पराजयं कर्त्तुं शक्नुयात् स एव राज्यं कर्तुमर्हेत् ॥१०॥