Rigveda / 4 / 32 / 11
ता ते॑ गृणन्ति वे॒धसो॒ यानि॑ च॒कर्थ॒ पौंस्या॑। सु॒तेष्वि॑न्द्र गिर्वणः ॥११॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 32 | Mantra No : 11
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : indra: | Metre : pipiilikaamadhyaagaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : taa te gRRiNanti vedhaso yaani chakartha pau.msyaa. suteShvindra girvaNaH .11.
Component Words : taa. te. gRRiNanti. vedhasaH. yaani. chakartha. pau.msyaa. suteShu. indra. girvaNaH .11.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पिपीलिकामध्यागायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : ता। ते॒। गृ॒ण॒न्ति॒। वे॒धसः॑। यानि॒। च॒कर्थ॑। पौंस्या॑। सु॒तेषु॑। इ॒न्द्र॒। गि॒र्व॒णः॒ ॥११॥
पदार्थ : हे (गिर्वणः) वाणियों से स्तुति किये गये (इन्द्र) राजन् ! (यानि) जो (वेधसः) बुद्धिमान् (ते) आपके (पौंस्या) पुरुषों के लिये हितकारक बलों को (गृणन्ति) कहते हैं और जिनको आप (सुतेषु) उत्पन्न पदार्थों में (चकर्थ) करते हो (ता) उनकी हम लोग प्रशंसा करें ॥११॥
भावार्थ : वे ही प्रशंसा करने योग्य कर्म्म होते हैं कि जिनकी यथार्थवक्ता जन प्रशंसा करें ॥११॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पिपीलिकामध्यागायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : ता। ते॒। गृ॒ण॒न्ति॒। वे॒धसः॑। यानि॒। च॒कर्थ॑। पौंस्या॑। सु॒तेषु॑। इ॒न्द्र॒। गि॒र्व॒णः॒ ॥११॥
पदार्थ : (ता) तानि (ते) तव (गृणन्ति) (वेधसः) मेधाविनः (यानि) (चकर्थ) करोषि (पौंस्या) पुंभ्यो हितानि बलानि (सुतेषु) निष्पन्नेषु पदार्थेषु (इन्द्र) राजन् (गिर्वणः) गीर्भिः स्तुत ॥११॥
अन्वय : हे गिर्वण इन्द्र ! यानि वेधसस्ते पौंस्या गृणन्ति यानि त्वं सुतेषु चकर्थ ता वयं प्रशंसेम ॥११॥
भावार्थ : तान्येव प्रशंसनीयानि कर्माणि भवन्ति यान्याप्ताः प्रशंसेयुः ॥११॥