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Rigveda / 4 / 41 / 4

इन्द्रा॑ यु॒वं व॑रुणा दि॒द्युम॑स्मि॒न्नोजि॑ष्ठमुग्रा॒ नि व॑धिष्टं॒ वज्र॑म्। यो नो॑ दु॒रेवो॑ वृ॒कति॑र्द॒भीति॒स्तस्मि॑न्मिमाथाम॒भिभू॒त्योजः॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 41 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्रावरुणौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्रा॑। यु॒वम्। व॒रु॒णा॒। दि॒द्युम्। अ॒स्मि॒न्। ओजि॑ष्ठम्। उ॒ग्रा॒। नि। व॒धि॒ष्ट॒म्। वज्र॑म्। यः। नः॒। दुः॒ऽएवः॑। वृ॒कतिः॑। द॒भीतिः॑। तस्मि॑न्। मि॒मा॒था॒म्। अ॒भिऽभू॑ति। ओजः॑ ॥४॥

पदार्थ : हे (इन्द्रा) शत्रु के नाश करनेवाले राजन् और (वरुणा) श्रेष्ठ मन्त्रीजन ! (उग्रा) तेजस्वी (युवम्) आप दोनों (अस्मिन्) इस में (ओजिष्ठम्) अत्यन्त पराक्रमयुक्त (दिद्युम्) विद्या और न्याय के प्रकाशरूप (वज्रम्) वज्र को ग्रहण कर शत्रुओं का (नि, वधिष्टम्) निरन्तर नाश करो तथा (यः) जो (दुरेवः) दुःख से प्राप्त होने योग्य (वृकतिः) भेड़िये के सदृश शत्रुओं का नाश करनेवाला (दभीतिः) हिंसक (नः) हम लोगों के लिये (अभिभूति) तिरस्कार करनेवाला (ओजः) पराक्रम है उसको (मिमाथाम्) रचो और (तस्मिन्) उस में विश्वास को करो ॥४॥

भावार्थ : हे राजा और मन्त्री जनो ! आप ब्रह्मचर्य्य, विद्या, सत्याचरण और जितेन्द्रियत्वादि गुणों से अतुल बल को बढ़ाय के शत्रुओं का निवारण और प्रजाओं का अच्छे प्रकार पालन करके निष्कण्टक राज्यानन्द का निरन्तर भोग करें ॥४॥