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Rigveda / 4 / 41 / 5

इन्द्रा॑ यु॒वं व॑रुणा भू॒तम॒स्या धि॒यः प्रे॒तारा॑ वृष॒भेव॑ धे॒नोः। सा नो॑ दुहीय॒द्यव॑सेव ग॒त्वी स॒हस्र॑धारा॒ पय॑सा म॒ही गौः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 41 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्रावरुणौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर अध्यापकोपदेशक विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्रा॑। यु॒वम्। व॒रु॒णा॒। भू॒तम्। अ॒स्याः। धि॒यः। प्रे॒तारा॑। वृ॒ष॒भा॒ऽइ॑व। धे॒नोः। सा। नः॒। दु॒ही॒य॒त्। यव॑साऽइव। ग॒त्वी। स॒हस्र॑ऽधारा। पय॑सा। म॒ही। गौः ॥५॥

पदार्थ : हे (इन्द्रा) विद्या और ऐश्वर्य्य से युक्त (वरुणा) प्रशंसित गुणवान् (प्रेतारा) प्राप्त होनेवाले ! (युवम्) आप दोनों (अस्याः) इस (धियः) बुद्धि के (धेनोः) गौ के सम्बन्ध में (वृषभेव) बैल के सदृश (भूतम्) व्यतीत हुए विषय को प्राप्त होओ और जैसे (सा) वह (सहस्रधारा) असंख्य प्रवाहवाली वाणी (मही) बड़ी (गौः) चलनेवाली गौ (पयसा) दुग्धादि से (यवसेव) भूसा आदि के सदृश (नः) हम लोगों को (गत्वी) प्राप्त होकर (दुहीयत्) पूर्ण करे, वैसे श्रेष्ठ गुणों से पूर्ण करो ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! आप सब के लिये ऐसी बुद्धि देओ कि जिससे सब पूर्ण मनोरथवाले होवें ॥५॥