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Rigveda / 1 / 31 / 11

त्वाम॑ग्ने प्रथ॒ममा॒युमा॒यवे॑ दे॒वा अ॑कृण्व॒न्नहु॑षस्य वि॒श्पति॑म्। इळा॑मकृण्व॒न्मनु॑षस्य॒ शास॑नीं पि॒तुर्यत्पु॒त्रो मम॑कस्य॒ जाय॑ते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 31 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वह कैसा है और क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : त्वाम्। अ॒ग्ने॒। प्र॒थ॒मम्। आ॒युम्। आ॒यवे॑। दे॒वाः। अ॒कृ॒ण्व॒न्। नहु॑षस्य। वि॒श्पति॑म्। इळा॑म्। अ॒कृ॒ण्व॒न्। मनु॑षस्य। शास॑नीम्। पि॒तुः। यत्। पु॒त्रः। मम॑कस्य। जाय॑ते ॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विज्ञानयुक्त सभाध्यक्ष ! (देवाः) विद्वानों ने (नहुषस्य) मनुष्य की (आयवे) विज्ञानवृद्धि के लिये इस (इळाम्) वेदवाणी को (अकृण्वन्) प्रकाशित किया तथा (मनुष्यस्य) मनुष्यमात्र की (शासनीम्) सत्य शिक्षा को (अकृण्वन्) प्रकाशित किया और (यत्) जैसे (ममकस्य) हम लोग (पितुः) पिता होते हैं, उनका (पुत्रः) पुत्र अपने शील से पितृवर्ग को पवित्र करनेवाला (जायते) उत्पन्न होता है, वैसे राजवर्गों के प्रजाजन होते हैं ॥ ११ ॥

भावार्थ : ईश्वरोक्त व्यवस्था करनेवाले वेद शास्त्र और राजनीति के विना प्रजा पालनेहारा सभापति राजा प्रजा नहीं पाल सकता है और प्रजा राजा के अज्ञ सन्तान के तुल्य होती है, इससे सभापति राजा पुत्र के समान प्रजा को शिक्षा देवे ॥ ११ ॥