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Rigveda / 1 / 31 / 12

त्वं नो॑ अग्ने॒ तव॑ देव पा॒युभि॑र्म॒घोनो॑ रक्ष त॒न्व॑श्च वन्द्य। त्रा॒ता तो॒कस्य॒ तन॑ये॒ गवा॑म॒स्यनि॑मेषं॒ रक्ष॑माण॒स्तव॑ व्र॒ते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 31 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र में भी सभापति का उपदेश किया है ॥

पदपाठ : त्वम्। नः॒। अ॒ग्ने॒। तव॑। दे॒व॒। पा॒युऽभिः॑। म॒घोनः॑। र॒क्ष॒। त॒न्वः॑। च॒। व॒न्द्य॒। त्रा॒ता। तो॒कस्य॑। तन॑ये। गवा॑म्। अ॒सि॒। अनि॑ऽमेषम्। रक्ष॑माणः। तव॑। व्र॒ते ॥

पदार्थ : हे (देव) सब सुख देने और (वन्द्य) स्तुति करने योग्य (अग्ने) तथा यथोचित सबकी रक्षा करनेवाले सभेश्वर ! (तव) सर्वाधिपति आपके (व्रते) सत्य पालन आदि नियम में प्रवृत्त और (मघोनः) प्रशंसनीय धनयुक्त (नः) हम लोगों को और हमारे (तन्वः) शरीरों को (पायुभिः) उत्तम रक्षादि व्यवहारों से (अनिमेषम्) प्रतिक्षण (रक्ष) पालिये (रक्षमाणः) रक्षा करते हुए आप जो कि आपके उक्त नियम में वर्त्तमान (तोकस्य) छोटे-छोटे बालक वा (गवाम्) प्राणियों की मन आदि इन्द्रियाँ और गाय बैल आदि पशु हैं उनके तथा (अस्य) सब चराचर जगत् के प्रतिक्षण (त्राता) रक्षक अर्थात् अत्यन्त आनन्द देनेवाले हूजिये ॥ १२ ॥

भावार्थ : सभापति राजा ईश्वर के जो संसार की धारणा और पालना आदि गुण हैं, उनके तुल्य उत्तम गुणों से अपने राज्य के नियम में प्रवृत्त जनों की निरन्तर रक्षा करे ॥ १२ ॥