Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 2 / 4

क्षेत्रा॑दपश्यं सनु॒तश्चर॑न्तं सु॒मद्यू॒थं न पु॒रु शोभ॑मानम्। न ता अ॑गृभ्र॒न्नज॑निष्ट॒ हि षः पलि॑क्नी॒रिद्यु॑व॒तयो॑ भवन्ति ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 2 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कुमार आत्रेयो वृषो वा जार उभौ वा | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विवाहसम्बन्धी सन्तानविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : क्षेत्रा॑त्। अ॒प॒श्य॒म्। स॒नु॒तरिति॑। चर॑न्तम्। सु॒ऽमत्। यू॒थम्। न। पु॒रु। शोभ॑मानम्। न। ताः। अ॒गृ॒भ्र॒न्। अज॑निष्ट। हि। सः। पलि॑क्नीः। इत्। यु॒व॒तयः॑। भ॒व॒न्ति॒ ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो मैं जिस (क्षेत्रात्) संस्कार की हुई स्त्री से उत्पन्न (चरन्तम्) व्यवहार करते हुए (सुमत्) आप ही (पुरु) बहुत (शोभमानम्) शोभायुक्त [के] (न) समान वा (यूथम्) सेनासमूह के (न) समान बलिष्ठ को (सनुतः) सनातन से (अपश्यम्) देखता हूँ (सः) वह सुखी (अजनिष्ट) होता है और जो ब्रह्मचारिणी कन्यायें उत्तम नियमोंवाली हुई युवावस्था के प्रथम पतियों को (अगृभ्रन्) ग्रहण करती हैं (ताः) वे (हि) ही (युवतयः) युवति हुईं पुत्र पौत्रों के अतिसुख के युक्त (इत्) और (पलिक्नीः) श्वेत केशोंवाली अर्थात् वृद्धावस्थायुक्त (भवन्ति) होती हैं ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! यदि आप लोग अपने सन्तानों को अतिकाल पर्यन्त ब्रह्मचर्य्य करावें तो वे धर्मिष्ठ बुद्धियुक्त और चिरञ्जीवी हुए आप लोगों के लिये अतीव सुख देवें ॥४॥