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Rigveda / 5 / 2 / 5

के मे॑ मर्य॒कं वि य॑वन्त॒ गोभि॒र्न येषां॑ गो॒पा अर॑णश्चि॒दास॑। य ईं॑ जगृ॒भुरव॒ ते सृ॑ज॒न्त्वाजा॑ति प॒श्व उप॑ नश्चिकि॒त्वान् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 2 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कुमार आत्रेयो वृषो वा जार उभौ वा | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : के। मे॒। म॒र्य॒कम्। वि। य॒व॒न्त॒। गोभिः॑। न। येषा॑म्। गो॒पाः। अर॑णः। चि॒त्। आस॑। ये। ई॒म्। ज॒गृ॒भुः। अव॑। ते। सृ॒ज॒न्तु॒। आ। अ॒जा॒ति॒। प॒श्वः। उप॑। नः॒। चि॒कि॒त्वान् ॥५॥

पदार्थ : हे विद्वानो ! (के) कौन (गोपाः) गौओं के पालन करनेवाले (गोभिः) गौओं के (न) सदृश (मे) मेरे (मर्यकम्) अल्प मनुष्य को (वि, यवन्त) दूर करें और (येषाम्) जिनका वह (चित्) निश्चित (अरणः) मिलनेवाला (आस) होता है और (ये) जो (पश्वः) पशुओं को (जगृभुः) ग्रहण करें (ते) वे (आ, अजाति) अच्छे प्रकार सन्तानों की उत्पत्ति जिस कुल में उसको (उप, सृजन्तु) उत्पन्न करें और जो (ईम्) विद्या ग्रहण करें, वे दुःख को (अव) दूर करें और जो (चिकित्वान्) बुद्धिमान् उत्पन्न करता है वह (नः) हम लोगों का हितैषी है, यह समझाओ ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के प्रति यह पूछें कौन हम लोगों के थोड़े ज्ञानवाले सन्तानों को उत्तम बुद्धिवाले कर सकें, वे विद्वान् यह उत्तर देवें कि जो यथार्थवादी हों, वे ही उक्त काम को कर सकें, अन्य जन नहीं ॥५॥