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Rigveda / 5 / 2 / 6

व॒सां राजा॑नं वस॒तिं जना॑ना॒मरा॑तयो॒ नि द॑धु॒र्मर्त्ये॑षु। ब्रह्मा॒ण्यत्रे॒रव॒ तं सृ॑जन्तु निन्दि॒तारो॒ निन्द्या॑सो भवन्तु ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 2 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : कुमार आत्रेयो वृषो वा जार उभौ वा | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : व॒साम्। राजा॑नम्। व॒स॒तिम्। जना॑नाम्। अरा॑तयः। नि। द॒धुः॒। मर्त्ये॑षु। ब्रह्मा॑णि। अत्रेः॑। अव॑। तम्। सृ॒जन्तु॒। नि॒न्दि॒तारः॑। निन्द्या॑सः। भ॒व॒न्तु॒ ॥६॥

पदार्थ : जो (वसाम्) वसते हुए प्राणियों और (जनानाम्) सज्जन पुरुषों के (राजानम्) न्याय करनेवाले को और (वसतिम्) निवास को प्रकट करे, (तम्) उसको विद्वान् जन (अव, सृजन्तु) न निकाल दें और जो (निन्दितारः) गुणों में दोषों और दोषों में गुणों का स्थापन करनेवाले (निन्द्यासः) अधर्म के आचरण से निन्दा करने योग्य और (अरातयः) अन्याय से ग्रहण करनेवाले शत्रुजन (मर्त्येषु) मरणधर्म्मा मनुष्यों में (ब्रह्माणि) बड़े धनों को (नि, दधुः) स्थापन करें वे (अत्रेः) तीन प्रकार के दुःख से रहित के भी दूर स्थित (भवन्तु) हों ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो निकृष्ट कर्म्म करने और दूसरे के द्रव्य के हरनेवाले द्वेषकर्त्ता हों, उनको दण्ड देकर निर्जन देश में बाँधो और जो स्तुति करनेवाले धर्म्मिष्ठ होवें, उनको समीप में निवास देकर सदा सत्कार करो ॥६॥