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Rigveda / 5 / 5 / 4

ऊर्ण॑म्रदा॒ वि प्र॑थस्वा॒भ्य१॒॑र्का अ॑नूषत। भवा॑ नः शुभ्र सा॒तये॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 5 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : पिपीलिकामध्यागायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उसी विषय कहते हैं ॥

पदपाठ : ऊर्ण॑ऽम्रदाः। वि। प्र॒थ॒स्व॒। अ॒भि। अ॒र्काः। अ॒नू॒ष॒त॒। भव॑। नः॒। शु॒भ्र॒। सा॒तये॑ ॥४॥

पदार्थ : हे (शुभ्र) शुद्ध आचरण करनेवाले राजन् ! आप (सातये) दाय विभाग के लिये (वि, प्रथस्व) प्रसिद्ध कीजिये और हम लोगों के लिये सुखकारी (भवा) हूजिये। हे (ऊर्णम्रदाः) रक्षकों के सहित मर्दन करने और (अर्काः) मन्त्र और अर्थ के जाननेवाले आप लोगो ! (नः) हम लोगों को सम्पूर्ण विद्याओं से सम्पन्न (अभि, अनूषत) कीजिये ॥४॥

भावार्थ : राजा और राजपुरुष विभाग करके अपने-अपने अंश अर्थात् हिस्से को ग्रहण करें और प्रजाओं के भाग प्रजाओं के लिये देवें ॥४॥