Rigveda / 5 / 5 / 5
देवी॑र्द्वारो॒ वि श्र॑यध्वं सुप्राय॒णा न॑ ऊ॒तये॑। प्रप्र॑ य॒ज्ञं पृ॑णीतन ॥५॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 5 | Mantra No : 5
In English:
Seer : vasushruta aatreyaH | Devta : aapriyaH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : deviirdvaaro vi shrayadhva.m supraayaNaa na uutaye. prapra yaj~na.m pRRiNiitana .5.
Component Words : deviiH. dvaaraH. vi. shrayadhvam. su.apra.aayanaaH. naH. uutaye. pra.apra. yaj~nam. pRRiNiitana .5.
In Hindi:
ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अब गृहाश्रमविषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : देवीः॑। द्वा॒रः॒। वि। श्र॒य॒ध्व॒म्। सु॒ऽप्र॒ऽअ॒य॒नाः। नः॒। ऊ॒तये॑। प्रऽप्र॑। य॒ज्ञम्। पृ॒णी॒त॒न॒ ॥५॥
पदार्थ : हे पुरुषो ! तुम (सुप्रायणाः) उत्तम प्रकार गृहों में प्रवेश हो जिनसे ऐसी (देवीः) श्रेष्ठ और शुद्ध (द्वारः) द्वारों के सदृश सुख की कारणभूत उत्तम स्त्रियों का (वि, श्रयध्वम्) विशेष करके सेवन करो और (नः) हम लोगों के (ऊतये) रक्षण आदि के लिये (यज्ञम्) गृहाश्रमव्यवहार को (प्रप्र, पृणीतन) पुष्ट करो ॥५॥
भावार्थ : यदि तुल्य गुण, कर्म, स्वभाववाले स्त्री-पुरुष विवाह करके गृहाश्रम का आरम्भ करें तो पूर्ण सुख पावें ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : अथ गृहाश्रमविषयमाह ॥
पदपाठ : देवीः॑। द्वा॒रः॒। वि। श्र॒य॒ध्व॒म्। सु॒ऽप्र॒ऽअ॒य॒नाः। नः॒। ऊ॒तये॑। प्रऽप्र॑। य॒ज्ञम्। पृ॒णी॒त॒न॒ ॥५॥
पदार्थ : (देवीः) दिव्याः शुद्धाः (द्वारः) द्वाराणीव सुखनिमित्ताः (वि) (श्रयध्वम्) विशेषेण सेवध्वम् (सुप्रायणाः) सुष्ठु प्रकृष्टमयनं गमनं याभ्यस्ताः (नः) अस्माकम् (ऊतये) रक्षणाद्याय (प्रप्र) (यज्ञम्) गृहाश्रमव्यवहारम् (पृणीतन) अलं कुरुत ॥५॥
अन्वय : हे पुरुषा ! यूयं सुप्रायणा देवीर्द्वार इवोत्तमाः पत्नीर्वि श्रयध्वं न ऊतये यज्ञं प्रप्र पृणीतन ॥५॥
भावार्थ : यदि तुल्यगुणकर्म्मस्वभावाः स्त्रीपुरुषा विवाहं कृत्वा गृहाश्रमारभेरंस्तर्हि पूर्णं सुखं लभेरन् ॥५॥