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Rigveda / 5 / 8 / 5

त्वम॑ग्ने पुरु॒रूपो॑ वि॒शेवि॑शे॒ वयो॑ दधासि प्र॒त्नथा॑ पुरुष्टुत। पु॒रूण्यन्ना॒ सह॑सा॒ वि रा॑जसि॒ त्विषिः॒ सा ते॑ तित्विषा॒णस्य॒ नाधृषे॑ ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 8 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : इष आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। अ॒ग्ने॒। पु॒रु॒ऽरूपः॑। वि॒शेऽवि॑शे। वयः॑। द॒धा॒सि॒। प्र॒त्नऽथा॑। पु॒रु॒ऽस्तु॒त॒। पु॒रूणि॑। अन्ना॑। सह॑सा। वि। रा॒ज॒सि॒। त्विषिः॑। सा। ते॒। ति॒त्वि॒षा॒णाय। न। आ॒ऽधृषे॑ ॥५॥

पदार्थ : हे (पुरुष्टुत) बहुतों से प्रशंसित (अग्ने) राजन् ! जिससे आप (वि, राजसि) विशेष प्रकाशमान हैं (सा) वह (तित्विषाणस्य) अग्निज्वाला के समान विद्या से प्रकाशमान (ते) आपकी (त्विषिः) दीप्ति है और वह (आधृषे) सब प्रकार से धृष्ट के लिये (न) जैसे वैसे (विशेविशे) प्रजा-प्रजा के लिये (पुरूणि) बहुत (अन्ना) अन्नों को धारण करती है तथा जिससे (त्वम्) आप प्रजा-प्रजा के लिये (पुरुरूपः) बहुत रूपवाले आप (प्रत्नथा) प्राचीन के सदृश (सहसा) बल से (वयः) जीवन को (दधासि) धारण करते हो, उसको विशेषता से जानिये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! आप लोग जैसे अग्नि सब जगत् को धारण करता है, वैसे सब मनुष्यों को विद्या के प्रकाश में धारण करो ॥५॥