Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 8 / 6

त्वाम॑ग्ने समिधा॒नं य॑विष्ठ्य दे॒वा दू॒तं च॑क्रिरे हव्य॒वाह॑नम्। उ॒रु॒ज्रय॑सं घृ॒तयो॑नि॒माहु॑तं त्वे॒षं चक्षु॑र्दधिरे चोद॒यन्म॑ति ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 8 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : इष आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वाम्। अ॒ग्ने॒। स॒म्ऽइ॒धा॒नम्। य॒वि॒ष्ठ्य॒। दे॒वाः। दू॒तम्। च॒क्रि॒रे॒। ह॒व्य॒ऽवाह॑नम्। उ॒रु॒ऽज्रय॑सम्। घृ॒तऽयो॑निम्। आऽहु॑तम्। त्वे॒षम्। चक्षुः॑। द॒धि॒रे॒। चो॒द॒यत्ऽम॑ति ॥६॥

पदार्थ : हे (यविष्ठ्य) अत्यन्त युवाजनों में श्रेष्ठ (अग्ने) विद्वन् जैसे (देवाः) विद्वान् जन (हव्यवाहनम्) ग्रहण करने योग्य वाहनों को शीघ्र प्राप्त करनेवाले (उरुज्रयसम्) बहुत वेगयुक्त (घृतयोनिम्) जल वा प्रदीप्त अथवा कारण है गृह जिसका (आहुतम्) जो सब ओर से शब्दयुक्त (त्वेषम्) प्रदीप्त तथा (चोदयन्मति) बुद्धि को प्रेरणा करने और (चक्षुः) पदार्थों को दिखानेवाले (समिधानम्) प्रकाशमान अग्नि को (दधिरे) धारण करते और (दूतम्) सब ओर से व्यवहारसाधक (चक्रिरे) करते हैं, वैसे (त्वाम्) आप को हम लोग धारण करें ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य विद्वानों के सङ्ग के बिना अग्नियों के गुण और अग्नि आदि संयोग के गुणों को जानने योग्य नहीं होते हैं ॥६॥