Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 31 / 5

वृष्णे॒ यत्ते॒ वृष॑णो अ॒र्कमर्चा॒निन्द्र॒ ग्रावा॑णो॒ अदि॑तिः स॒जोषाः॑। अ॒न॒श्वासो॒ ये प॒वयो॑ऽर॒था इन्द्रे॑षिता अ॒भ्यव॑र्तन्त॒ दस्यू॑न् ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 31 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अमहीयुः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वृष्णे॑। यत्। ते॒। वृष॑णः। अ॒र्कम्। अर्चा॑न्। इन्द्र॑। ग्रावा॑णः। अदि॑तिः। स॒ऽजोषाः॑। अ॒न॒श्वासः॑। ये। प॒वयः॑। अ॒र॒थाः। इन्द्र॑ऽइषिताः। अ॒भि। अव॑र्तन्त। दस्यू॑न् ॥५॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) दुष्ट दलों के नाश करनेवाले राजन् ! (यत्) जिन (वृष्णे) वृष्टि करनेवाले (ते) आपके लिये (अर्कम्) सत्कार करने योग्य का प्रजाजन (अर्चान्) सत्कार करें वह जैसे (वृषणः) वर्षा के निमित्त (ग्रावाणः) मेघ और (सजोषाः) समान प्रीति का सेवन करनेवाला और (अदितिः) अन्तरिक्ष वर्त्तमान हैं, वैसे हूजिये और (ये) जो (अरथाः) वाहनों से रहित (अनश्वासः) घोड़ों से रहित (इन्द्रेषिताः) स्वामी से प्रेरणा किये गये (पवयः) चक्र (दस्यून्) दुष्ट चोरों के (अभि) सन्मुख (अवर्त्तन्त) वर्त्तमान हैं, उनका आप निरन्तर सत्कार कीजिये ॥५॥

भावार्थ : जो राजाजन मेघ के सदृश सुख वर्षाने और आकाश के सदृश नहीं हिलनेवाले, अग्नि आदिकों के वाहनों को रच के इधर-उधर भ्रमण करके दुष्ट चोरों का नाश करके प्रजाओं को प्रसन्न करें, वे भाग्यशाली होते हैं ॥५॥