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Rigveda / 5 / 31 / 6

प्र ते॒ पूर्वा॑णि॒ कर॑णानि वोचं॒ प्र नूत॑ना मघव॒न्या च॒कर्थ॑। शक्ती॑वो॒ यद्वि॒भरा॒ रोद॑सी उ॒भे जय॑न्न॒पो मन॑वे॒ दानु॑चित्राः ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 31 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अमहीयुः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वानों के गुणों को कहते हैं ॥

पदपाठ : प्र। ते॒। पूर्वा॑णि॒। कर॑णानि। वो॒च॒म्। प्र। नूत॑ना। म॒घ॒ऽव॒न्। या। च॒कर्थ॑। शक्ति॑ऽवः। यत्। वि॒ऽभराः॑। रोद॑सी॒ इति॑। उ॒भे इति॑। जय॑न्। अ॒पः। म॑नवे। दानु॑ऽचित्राः ॥६॥

पदार्थ : हे (शक्तीवः) बहुत प्रकार [की] सामर्थ्य से युक्त (मघवन्) श्रेष्ठ ऐश्वर्य्यवाले राजन् ! बुद्धिमान् जन (यत्) जैसे (या) जिन (पूर्वाणि) प्राचीन (करणानि) साधनों और जिन (नूतना) नवीनों को (प्र) सिद्ध करते हैं, उन साधनों का मैं (ते) आपके लिये वैसे (प्र, वोचम्) उपदेश करूँ और जो (विभराः) विशेष करके पोषण करने और (दानुचित्राः) अद्भुत दानवाले विद्वान् जन (मनवे) मनुष्य के लिये (उभे) दोनों (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को जनाते हैं, उनके साथ आप मनुष्य के लिये (अपः) सूर्य्य जैसे जलों को वैसे शत्रुओं के प्राणों को (जयन्) जीतते हुए उनके सुख के लिये सत्कार को (चकर्थ) करते हैं ॥६॥

भावार्थ : हे राजा आदि जनो ! जो विद्वान् जन आप लोगों के लिये अनादिकाल से सिद्ध राजनीति और विजय के उपायों की शिक्षा करें, उनको अपने आत्मा के सदृश आप लोग सत्कार करें ॥६॥