Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 31 / 7

तदिन्नु ते॒ कर॑णं दस्म वि॒प्राहिं॒ यद्घ्नन्नोजो॒ अत्रामि॑मीथाः। शुष्ण॑स्य चि॒त्परि॑ मा॒या अ॑गृभ्णाः प्रपि॒त्वं यन्नप॒ दस्यूँ॑रसेधः ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 31 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : अमहीयुः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : तत्। इत्। नु। ते॒। कर॑णम्। द॒स्म॒। वि॒प्र॒। अहि॑म्। यत्। घ्नन्। ओजः॑। अत्र॑। अमि॑मीथाः। शुष्ण॑स्य। चि॒त्। परि॑। मा॒याः। अ॒गृ॒भ्णाः॒। प्र॒ऽपि॒त्वम्। यन्। अप॑। दस्यू॑न्। अ॒से॒धः॒ ॥७॥

पदार्थ : हे (दस्म) उपेक्षा करनेवाले (विप्र) बुद्धिमान् ! आप सूर्य्य (अहिम्) जैसे मेघ को वैसे दोषों को नाश करते हैं (अत्र) वा इस जगत् में (ओजः, यत्) जल के सदृश जो बल को गिराते हैं (तत्) वह (करणम्) साधन जैसे हो, वैसे शत्रु के बल का (घ्नन्) नाश करते हुए इस जगत् में तुम (शुष्णस्य) बल की वृद्धि का (अमिमीथाः) निर्माण करो (चित्) और (मायाः) बुद्धियों का (परि, अगृभ्णाः) सब ओर से ग्रहण करो और (प्रपित्वम्) प्राप्ति को (यन्) प्राप्त होते हुए (दस्यून्) दुष्टों का (अप, असेधः) निवारण करें उन (ते) आपके लिये (नु) तर्क-वितर्क के साथ (इत्) ही सुख प्राप्त होवे ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे विद्वन् ! जैसे ईश्वर ने सूर्य्य और मेघ का सम्बन्ध रचा, वैसे ही अन्य भी बहुत सम्बन्ध रचे, यह जानना चाहिये ॥७॥