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Rigveda / 5 / 55 / 4

आ॒भू॒षेण्यं॑ वो मरुतो महित्व॒नं दि॑द्द॒क्षेण्यं॒ सूर्य॑स्येव॒ चक्ष॑णम्। उ॒तो अ॒स्माँ अ॑मृत॒त्वे द॑धातन॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 55 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : आ॒ऽभू॒षेण्य॑म्। वः॒। म॒रु॒तः॒। म॒हि॒ऽत्व॒नम्। दि॒दृ॒क्षेण्य॑म्। सूर्य॑स्यऽइव। चक्ष॑णम्। उ॒तो इति। अ॒स्मान्। अ॒मृ॒त॒ऽत्वे। द॒धा॒त॒न॒। शुभ॑म्। या॒ताम्। अनु॑। रथाः॑। अ॒वृ॒त्स॒त॒ ॥४॥

पदार्थ : हे (मरुतः) प्राण के सदृश प्रिय आचरण करनेवालो ! जिन (वः) आप लोगों का (सूर्य्यस्येव) सूर्य्य के सदृश (आभूषेण्यम्) शोभा करने और (दिदृक्षेण्यम्) देखने को योग्य (चक्षणम्) प्रकाश (महित्वनम्) और बड़प्पन है जिससे (उतो) निश्चित (अस्मान्) हम लोगों को (अमृतत्वे) नाशरहित पदार्थों के भाव अर्थात् नित्यपन के वर्त्तमान होने पर (दधातन) धारण कीजिये और जिन (शुभम्) धर्मयुक्त मार्ग को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथाः) वाहन (अनु, अवृत्सत) अनुकूल वर्त्तमान हैं, उनका हम लोग निरन्तर सत्कार करें ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य सूर्य्य के सदृश न्याय के प्रकाशक, अन्यायरूपी अन्धकार के रोकनेवाले, धर्ममार्ग के अनुगामी होवें, उनकी सदा ही आप लोग प्रशंसा करो ॥४॥