Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 55 / 5

उदी॑रयथा मरुतः समुद्र॒तो यू॒यं वृ॒ष्टिं व॑र्षयथा पुरीषिणः। न वो॑ दस्रा॒ उप॑ दस्यन्ति धे॒नवः॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 55 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : स्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उत्। ई॒र॒य॒थ॒। म॒रु॒तः॒। स॒मु॒द्र॒तः। यू॒यम्। वृ॒ष्टिम्। व॒र्ष॒य॒थ॒। पु॒री॒षि॒णः॒। न। वः॒। द॒स्राः॒। उप॑। द॒स्य॒न्ति॒। धे॒नवः॑। शुभ॑म्। या॒ताम्। अनु॑। रथाः॑। अ॒वृ॒त्स॒त॒ ॥५॥

पदार्थ : हे (पुरीषिणः) बहुत प्रकार का पोषण विद्यमान जिनमें वे (मरुतः) मनुष्यो ! (यूयम्) आप लोग हम लोगों की श्रेष्ठकर्मों में (उत्, ईरयथा) प्रेरणा कीजिये और जैसे पवन (समुद्रतः) अन्तरिक्ष से (वृष्टिम्) वर्षा करते हैं, वैसे आप लोग (वर्षयथा) वर्षाइये जिससे (दस्राः) नाश होनेवाले और (धेनवः) वाणियाँ (वः) आप लोगों को (न) नहीं (उप, दस्यन्ति) उपक्षय करते जैसे (शुभम्) कल्याण को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथाः) वाहन (अनु, अवृत्सत) अनुकूल वर्त्तते हैं, वैसे धर्ममार्ग का अनुकूल वर्त्ताव कीजिये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमाङ्कार है। हे विद्वान् जनो ! जैसे पवन अन्तरिक्ष से वृष्टि करके सम्पूर्ण प्राणियों को तृप्त करके दुःख का नाश करते हैं, वैसे ही सत्यविद्या के उपदेश की वृष्टि से अविद्यारूप अन्धकार से हुए दुःख का निवारण कीजिये ॥५॥