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Rigveda / 5 / 57 / 4

वात॑त्विषो म॒रुतो॑ व॒र्षनि॑र्णिजो य॒माइ॑व॒ सुस॑दृशः सु॒पेश॑सः। पि॒शङ्गा॑श्वा अरु॒णाश्वा॑ अरे॒पसः॒ प्रत्व॑क्षसो महि॒ना द्यौरि॑वो॒रवः॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 57 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वात॑ऽत्विषः। म॒रुतः॑। व॒र्षऽनि॑र्निजः। य॒माःऽइ॑व। सुऽस॑दृशः। सु॒ऽपेश॑सः। पि॒शङ्ग॑ऽअश्वाः। अ॒रु॒णऽअ॑श्वाः। अ॒रे॒पसः॑। प्रऽत्व॑क्षसः। म॒हि॒ना। द्यौःऽइ॑व। उ॒रवः॑ ॥४॥

पदार्थ : हे विद्वान् जनो ! जो (यमाइव) न्यायाधीशों के सदृश (वातत्विषः) वायु की कान्ति के समान कान्ति जिनकी ऐसे (वर्षनिर्णिजः) वर्ष का निर्णय करनेवाले (सुसदृशः) उत्तम प्रकार तुल्य गुण, कर्म और स्वभाव युक्त (सुपेशसः) उत्तम तुल्य रूप वा सुवर्ण जिनका वे (पिशङ्गाश्वाः) सब ओर से पीले वर्ण के घोड़ोंवाले (अरेपसः) अपराध से रहित (अरुणाश्वाः) रक्त वर्ण के घोड़ोंवाले (प्रत्वक्षसः) अत्यन्त सूक्ष्म करनेवाले (महिना) महिमा से (द्यौरिव) सूर्य्य के सदृश (उरवः) बहुत (मरुतः) मनुष्य होवें, उनका सत्कार करो ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य सूर्य्य के सदृश आत्मा से प्रकाशित और न्यायाधीशों के सदृश व्यवहार करनेवाले विमान आदि वाहन से युक्त हैं, उनका निरन्तर सत्कार करो ॥४॥