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Rigveda / 5 / 57 / 5

पु॒रु॒द्र॒प्सा अ॑ञ्जि॒मन्तः॑ सु॒दान॑वस्त्वे॒षसं॑दृशो अनव॒भ्ररा॑धसः। सु॒जा॒तासो॑ ज॒नुषा॑ रु॒क्मव॑क्षसो दि॒वो अ॒र्का अ॒मृतं॒ नाम॑ भेजिरे ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 57 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : पु॒रु॒ऽद्र॒प्साः। अ॒ञ्जि॒ऽमन्तः॑। सु॒ऽदान॑वः। त्वे॒षऽसं॑दृशः। अ॒न॒व॒भ्रऽरा॑धसः। सु॒ऽजा॒तासः॑। ज॒नुषा॑। रु॒क्मऽव॑क्षसः। दि॒वः। अ॒र्काः। अ॒मृत॑म्। नाम॑। भे॒जि॒रे॒ ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (पुरुद्रप्साः) बहुत मोहवाले (अञ्जिमन्तः) अच्छी कामना विद्यमान जिनकी ऐसे वा (सुदानवः) उत्तम दोनों के करने और (त्वेषसन्दृशः) प्रकाशित रूप को देखनेवाले (अनवभ्रराधसः) नहीं विद्यमान धन का नाश जिनके ऐसे और (जनुषा) जन्म से (सुजातासः) उत्तम प्रकार धर्म्मयुक्त व्यवहार से प्रसिद्ध (रुक्मवक्षसः) सुवर्ण आदि से जुड़े हुए आभूषण वक्षस्थलों में जिनके वे (दिवः) कामना करनेवाले (अर्काः) सत्कार करने योग्य जन (अमृतम्) नाश से रहित (नाम) [नाम] का (भेजिरे) सेवन करें, उनका सब प्रकार सत्कार करिये ॥५॥

भावार्थ : जो जन उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाव को सब प्रकार ग्रहण करते हैं, वे सब प्रकार से सुखी होते हैं ॥५॥