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Rigveda / 5 / 61 / 7

वि या जा॒नाति॒ जसु॑रिं॒ वि तृष्य॑न्तं॒ वि का॒मिन॑म्। दे॒व॒त्रा कृ॑णु॒ते मनः॑ ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 61 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : शशीयशी | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वि। या। जा॒नाति॑। जसु॑रिम्। वि। तृष्य॑न्तम्। वि। का॒मिन॑म्। दे॒व॒ऽत्रा। कृ॒णु॒ते। मनः॑ ॥७॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (या) जो (जसुरिम्) प्रयत्न करते हुए को (वि) विशेष करके (जानाति) जानती है (तृष्यन्तम्) पिपासा से व्याकुल हुए के तुल्य को (वि) विशेष करके जानती है और (कामिनम्) कामातुर पुरुष को (वि) विशेष करके जानती है वह (देवत्रा) विद्वानों में (मनः) चित्त (कृणुते) करती है ॥७॥

भावार्थ : जो स्त्री पुरुषार्थी, धार्मिक, लोभी और कामातुर पति को जानकर दोषों के निवारण और गुणों के ग्रहण करने के लिये प्रेरणा करती है, वही पति आदि की कल्याण करनेवाली होती है ॥७॥