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Rigveda / 5 / 61 / 8

उ॒त घा॒ नेमो॒ अस्तु॑तः॒ पुमाँ॒ इति॑ ब्रुवे प॒णिः। स वैर॑देय॒ इत्स॒मः ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 61 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : श्यावाश्व आत्रेयः | देवता : शशीयशी | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒त। घ॒। नेमः॑। अस्तु॑तः। पुमा॑न्। इति॑। ब्रु॒वे॒। प॒णिः। सः। वैर॑ऽदेये। इत्। स॒मः ॥८॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अस्तुतः) नहीं प्रशंसा किया गया (उत) और (नेमः) आधे का अधिकारी (घा) ही (वैरदेये) वैर देने योग्य जिससे उसमें (पुमान्) पुरुष और जो (पणिः) प्रशंसित वर्त्तमान है (सः, इत्) वही (समः) तुल्य है (इति) इस प्रकार से मैं (ब्रुवे) कहता हूँ ॥८॥

भावार्थ : जो आलस्ययुक्त जन श्रेष्ठ कर्म्मों में नहीं प्रवृत्त होता है और दूसरा विद्वान् पुरुष सत्य और असत्य को जानकर सत्य का आचरण नहीं करता है, वे दोनों तुल्य अधर्मात्मा हैं, यह जानना चाहिये ॥८॥