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Rigveda / 6 / 5 / 5

यस्ते॑ य॒ज्ञेन॑ स॒मिधा॒ य उ॒क्थैर॒र्केभिः॑ सूनो सहसो॒ ददा॑शत्। स मर्त्ये॑ष्वमृत॒ प्रचे॑ता रा॒या द्यु॒म्नेन॒ श्रव॑सा॒ वि भा॑ति ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 5 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यः। ते॒। य॒ज्ञेन॑। स॒म्ऽइधा॑। यः। उ॒क्थैः। अ॒र्केभिः॑। सू॒नो॒ इति॑। स॒ह॒सः॒। ददा॑शत्। सः। मर्त्ये॑षु। अ॒मृ॒त॒। प्रऽचे॑ता। रा॒या। द्यु॒म्नेन॑। श्रव॑सा। वि। भा॒ति॒ ॥५॥

पदार्थ : हे (सहसः) बलवान् के (सूनो) पुत्र और (अमृत) मरणधर्म्म से रहित ! (यः) जो (यज्ञेन) विद्वानों के सत्कारनामक यज्ञ और (समिधा) सत्य के प्रकाशक वा ईंधन से तथा (यः) जो (अर्केभिः) आदर करने योग्य और (उक्थैः) कहने के योग्य पदार्थों से (ते) आपके लिये (ददाशत्) देता है (सः) वह (मर्त्येषु) मनुष्यों में (प्रचेताः) उत्तम ज्ञानवान् (राया) धन (द्युम्नेन) यश और (श्रवसा) अन्न वा श्रवण से (वि, भाति) प्रकाशित होता है, इस प्रकार विशेष करके जानो ॥५॥

भावार्थ : जो प्रशंसित कर्म्म और गुणों के सहित जन इस संसार में प्रयत्न करते हैं, वे विद्या, यश और धन से युक्त होकर संसार में प्रसिद्ध होते हैं ॥५॥