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Rigveda / 6 / 5 / 6

स तत्कृ॑धीषि॒तस्तूय॑मग्ने॒ स्पृधो॑ बाधस्व॒ सह॑सा॒ सह॑स्वान्। यच्छ॒स्यसे॒ द्युभि॑र॒क्तो वचो॑भि॒स्तज्जु॑षस्व जरि॒तुर्घोषि॒ मन्म॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 5 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। तत्। कृ॒धि॒। इ॒षि॒तः। तूय॑म्। अ॒ग्ने॒। स्पृधः॑। बा॒ध॒स्व॒। सह॑सा। सह॑स्वान्। यत्। श॒स्यसे॑। द्युऽभिः॑। अ॒क्तः। वचः॑ऽभिः। तत्। जु॒ष॒स्व॒। ज॒रि॒तुः। घोषि॑। मन्म॑ ॥६॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रतापयुक्त ! (यत्) जो आप (द्युभिः) प्रकाशमान दिनों से (अक्तः) रात्रि जैसे वैसे (शस्यसे) स्तुति किये जाते हो वह आप (वचोभिः) वचनों से (जरितुः) स्तुति करनेवाले का (घोषि) वाणी जिसमें ऐसा (मन्म) विज्ञान है (तत्) उसका (जुषस्व) सेवन करो (सः) वह (सहस्वान्) सहन करनेवाले आप (सहसा) बल से (स्पृधः) स्पर्धा करते हैं जिनमें उन सङ्गग्रामसेनाओं की (बाधस्व) बाधा करते हो तथा (तूयम्) शीघ्र (इषितः) प्रेरित हुए (तत्) उसको (कृधि) करो ॥६॥

भावार्थ : जो विद्वान् और ईश्वर से प्रेरित हुए शीघ्र आलस्य का त्याग करके दिन रात्रि धर्म्म, अर्थ और मोक्ष की सिद्धि के लिये प्रयत्न करते हैं, वे योग्य होकर दुःखों को बाधित करते हैं ॥६॥