Rigveda / 6 / 16 / 17
यत्र॒ क्व॑ च ते॒ मनो॒ दक्षं॑ दधस॒ उत्त॑रम्। तत्रा॒ सदः॑ कृणवसे ॥१७॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 16 | Mantra No : 17
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : agniH | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yatra kva cha te mano dakSha.m dadhasa uttaram. tatraa sadaH kRRiNavase .17.
Component Words : yatra. kva. cha. te. manaH. dakSham. dadhase. ut.ataram. tatra. sadaH. kRRiNavase .17.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : मनुष्यों को कहाँ मन स्थित करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : यत्र॑। क्व॑। च॒। ते॒। मनः॑। दक्ष॑म्। द॒ध॒से॒। उत्ऽत॑रम्। तत्र॑। सदः॑। कृ॒ण॒व॒से॒ ॥१७॥
पदार्थ : हे विद्वन् ! (यत्र) जहाँ (ते) आप का (मनः) विचारात्मक चित्त है और (उत्तरम्) पार होते हैं जिससे उस (दक्षम्) बल को (च) भी आप (दधसे) धारण करते हो (तत्र) वहाँ (सदः) स्थित होते हैं, जिसमें उसको (कृणवसे) करते हो तथा (क्व) कहाँ निवास करते हो, इस का उत्तर कहिये ॥१७॥
भावार्थ : हे मनुष्यो ! जहाँ जगदीश्वर वा योगाभ्यास में आप लोगों का अन्तःकरण पवित्र होकर कार्य्य की सिद्धि को करता है, वहाँ ही आप लोग भी प्रवृत्ति करिये ॥१७॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : मनुष्यैः कुत्र मनो धेयमित्याह ॥
पदपाठ : यत्र॑। क्व॑। च॒। ते॒। मनः॑। दक्ष॑म्। द॒ध॒से॒। उत्ऽत॑रम्। तत्र॑। सदः॑। कृ॒ण॒व॒से॒ ॥१७॥
पदार्थ : (यत्र) (क्व) कस्मिन् (च) (ते) तव (मनः) मननात्मकं चित्तम् (दक्षम्) बलम् (दधसे) (उत्तरम्) उत्तरन्ति येन तत् (तत्रा) । अत्र ऋचि तुनुघेति दीर्घः। (सदः) सीदन्ति यस्मिंस्तत् (कृणवसे) करोषि ॥१७॥
अन्वय : हे विद्वन् ! यत्र ते मन उत्तरं दक्षं च त्वं दधसे तत्रा सदः कृणवसे क्व वससीत्युत्तराणि वद ॥१७॥
भावार्थ : हे मनुष्या ! यत्र जगदीश्वरे योगाभ्यासे वा युष्माकमन्तःकरणं पवित्रं भूत्वा कार्य्यसिद्धिं करोति तत्रैव यूयमपि प्रवर्त्तध्वम् ॥१७॥