Rigveda / 6 / 16 / 18
न॒हि ते॑ पू॒र्तम॑क्षि॒पद्भुव॑न्नेमानां वसो। अथा॒ दुवो॑ वनवसे ॥१८॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 16 | Mantra No : 18
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : agniH | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : nahi te puurtamakShipadbhuvannemaanaa.m vaso. athaa duvo vanavase .18.
Component Words : nahi. te. puurttam. akShi.apat. bhuvat. nemaanaam. vaso iti. atha. duvaH. vanavase .18.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : मनुष्यों की किस प्रकार से इच्छा सिद्ध होती है, इस विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : न॒हि। ते॒। पू॒र्त्तम्। अ॒क्षि॒ऽपत्। भुव॑त्। ने॒मा॒ना॒म्। व॒सो॒ इति॑। अथ॑। दुवः॑। व॒न॒व॒से॒ ॥१८॥
पदार्थ : हे (वसो) वसानेवाले (ते) आपके (नेमानाम्) अन्नों के (पूर्त्तम्) पूर्ण करनेवाले को मैं भी (नहि) नहीं (अक्षिपत्) फेंकता और नहीं (भुवत्) होवे, इससे (अथा) इसके अनन्तर (दुवः) सेवा को (वनवसे) स्वीकार करिये ॥१८॥
भावार्थ : जो मनुष्य सत्य आचरण को करते हैं, उनकी कामना की पूर्ति कभी भी नहीं नष्ट की जाती है ॥१८॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : मनुष्याणां कथमिच्छा सिध्यतीत्याह ॥
पदपाठ : न॒हि। ते॒। पू॒र्त्तम्। अ॒क्षि॒ऽपत्। भुव॑त्। ने॒मा॒ना॒म्। व॒सो॒ इति॑। अथ॑। दुवः॑। व॒न॒व॒से॒ ॥१८॥
पदार्थ : (नहि) निषेधे (ते) तव (पूर्त्तम्) पूर्त्तिकरम् (अक्षिपत्) क्षिपति (भुवत्) भवेत् (नेमानाम्) अन्नानाम्। नेम इत्यन्ननाम। (निघं०२.७) (वसो) वासयितः (अथा) अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (दुवः) परिचरणम् (वनवसे) सम्भज ॥१८॥
अन्वय : हे वसो ! ते नेमानां पूर्त्तं कश्चिदपि नह्यक्षिपत्। नहि भुवत्तस्मादथा दुवो वनवसे ॥१८॥
भावार्थ : ये मनुष्याः सत्याचारं कुर्वन्ति तेषां कामपूर्तिं कदापि न हन्यते ॥१८॥