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Rigveda / 6 / 19 / 6

शवि॑ष्ठं न॒ आ भ॑र शूर॒ शव॒ ओजि॑ष्ठ॒मोजो॑ अभिभूत उ॒ग्रम्। विश्वा॑ द्यु॒म्ना वृष्ण्या॒ मानु॑षाणाम॒स्मभ्यं॑ दा हरिवो माद॒यध्यै॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 19 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : शवि॑ष्ठम्। नः॒। आ। भ॒र॒। शू॒र॒। शवः॑। ओजि॑ष्ठम्। ओजः॑। अ॒भि॒ऽभू॒ते॒। उ॒ग्रम्। विश्वा॑। द्यु॒म्ना। वृष्ण्या॑। मानु॑षाणाम्। अ॒स्म्भ्य॑म्। दाः॒। ह॒रि॒ऽवः॒। मा॒द॒यध्यै॑ ॥६॥

पदार्थ : हे (हरिवः) प्रशंसनीय मनुष्योंवाले (शूर) भयरहित (अभिभूते) दुष्टों के अभिभव करनेवाले ! आप (नः) हम लोगों को और (शविष्ठम्) अतिशय बलिष्ठ (उग्रम्) तीव्र (ओजः) प्राणधारण को और (ओजिष्ठम्) अत्यन्त पराक्रमयुक्त (शवः) बल को (आ, भर) सब प्रकार से धारण करो और इससे (मानुषाणाम्) मनुष्य जाति में वर्त्तमानों के सम्बन्ध में (विश्वा) सम्पूर्ण (वृष्ण्या) उत्तम जनों के लिये हितकारक (द्युम्ना) प्रकाशित यशों वा धनों को (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (मादयध्यै) आनन्द देने को (दाः) दीजिये ॥६॥

भावार्थ : हे राजन् ! आप राज्य के पालने योग्य गुणों को धारण करके न्याय से राज्य का पालन करिये ॥६॥