Rigveda / 6 / 19 / 7
यस्ते॒ मदः॑ पृतना॒षाळमृ॑ध्र॒ इन्द्र॒ तं न॒ आ भ॑र शूशु॒वांस॑म्। येन॑ तो॒कस्य॒ तन॑यस्य सा॒तौ मं॑सी॒महि॑ जिगी॒वांस॒स्त्वोताः॑ ॥७॥
Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 19 | Mantra No : 7
In English:
Seer : bharadvaajo baarhaspatyaH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : yaste madaH pRRitanaaShaaLamRRidhra indra ta.m na aa bhara shuushuvaa.msam. yena tokasya tanayasya saatau ma.msiimahi jigiivaa.msastvotaaH .7.
Component Words : yaH. te. madaH. pRRitanaaShaaT. amRRidhraH. indra. tam. naH. aa. bhara. shuushu.avaa.msam. yena. tokasya. tanayasya. saatau. ma.msiimahi. jigiivaa.msaH. tvaa.auutaaH .7.
In Hindi:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : यः। ते॒। मदः॑। पृ॒त॒ना॒षाट्। अमृ॑ध्रः। इन्द्र॑। तम्। नः॒। आ। भ॒र॒। शू॒शु॒ऽवांस॑म्। येन॑। तो॒कस्य॑। तन॑यस्य। सा॒तौ। मं॒सी॒महि॑। जि॒गी॒वांसः॑। त्वाऽऊ॑ताः ॥७॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) राजन् ! (ते) आप का (यः) जो (अमृध्रः) नहीं हिंसा करने और (पृतनाषाट्) सेनाओं को सहनेवाला (मदः) आनन्द है (येन) जिससे (जिगीवांसः) जीतनेवाले (त्वोताः) आप से रक्षित हम लोग (तोकस्य) सन्तान (तनयस्य) सुकुमार के (सातौ) संविभाग में रक्षा और विद्यावान् को (मंसीमहि) जानें और आप (तम्) उस (शूशुवांसम्) श्रेष्ठ गुणों से व्याप्त को (नः) हम लोगों के लिये (आ, भर) सब प्रकार से धारण करिये ॥७॥
भावार्थ : हे प्रजाजनो ! आप लोग राजा के प्रति यह कहो कि हम लोगों के सन्तान जिस प्रकार उत्तम शिक्षित हों, वैसे नियमों को करिये जिससे विजय और आनन्द बढ़े ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : यः। ते॒। मदः॑। पृ॒त॒ना॒षाट्। अमृ॑ध्रः। इन्द्र॑। तम्। नः॒। आ। भ॒र॒। शू॒शु॒ऽवांस॑म्। येन॑। तो॒कस्य॑। तन॑यस्य। सा॒तौ। मं॒सी॒महि॑। जि॒गी॒वांसः॑। त्वाऽऊ॑ताः ॥७॥
पदार्थ : (यः) (ते) तव (मदः) अतिहर्षः (पृतनाषाट्) यः पृतनाः सेनाः सहते सः (अमृध्रः) अहिंस्रः (इन्द्र) राजन् (तम्) (नः) अस्मभ्यम् (आ) (भर) (शूशुवांसम्) शुभगुणव्यापिनम् (येन) (तोकस्य) अपत्यस्य (तनयस्य) सुकुमारस्य (सातौ) संविभागे (मंसीमहि) विजानीयाम (जिगीवांसः) जेतुं शीलाः (त्वोताः) त्वया रक्षिताः ॥७॥
अन्वय : हे इन्द्र राजन् ! ते योऽमृध्रः पृतनाषाण्मदोऽस्ति येन जिगीवांसस्त्वोता वयं तोकस्य तनयस्य सातौ रक्षां विद्यादानं च मंसीमहि त्वं तं शूशुवांसं न आ भर ॥७॥
भावार्थ : हे प्रजाजना ! राजानं प्रत्येवं ब्रुवन्तु नोऽस्माकं सन्ताना यथा सुशिक्षिताः स्युस्तथा नियमान् विधेहि यतो विजयानन्दौ वर्धेयाताम् ॥७॥