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Rigveda / 6 / 26 / 2

त्वां वा॒जी ह॑वते वाजिने॒यो म॒हो वाज॑स्य॒ गध्य॑स्य सा॒तौ। त्वां वृ॒त्रेष्वि॑न्द्र॒ सत्प॑तिं॒ तरु॑त्रं॒ त्वां च॑ष्टे मुष्टि॒हा गोषु॒ युध्य॑न् ॥२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 26 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वाम्। वा॒जी। ह॒व॒ते॒। वा॒जि॒ने॒यः। म॒हः। वाज॑स्य। गध्य॑स्य। सा॒तौ। त्वाम्। वृ॒त्रेषु॑। इ॒न्द्र॒। सत्ऽप॑तिम्। तरु॑त्रम्। त्वाम्। च॒ष्टे॒। मु॒ष्टि॒ऽहा। गोषु॑। युध्य॑न् ॥२॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) दुष्टों के नाश करनेवाले जैसे (वाजिनेयः) ज्ञानवती की सन्तान और (वाजी) वेगयुक्त ज्ञानीजन (गध्यस्य) सबसे प्राप्त होने योग्य (वाजस्य) विज्ञान के (सातौ) उत्तम प्रकार विभाग में (त्वाम्) आपको (हवते) सुनावे, वैसे (वृत्रेषु) धनों में (सत्पतिम्) श्रेष्ठों के पालन करनेवाले (त्वाम्) आपको मैं (महः) बड़ा (चष्टे) कहता हूँ और (गोषु) प्राप्त होने योग्य भूमियों में (युध्यन्) युद्ध करता हुआ (मुष्टिहा) मुष्टि से मारनेवाला मारता हुआ [(वृत्रेषु)] धनों में (त्वाम्) आपको मैं (तरुत्रम्) पार करनेवाला कहता हूँ ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जहाँ-जहाँ प्रजाजन आपको प्राप्त होने की इच्छा करते हैं, वहाँ-वहाँ आप उपस्थित हूजिये ॥२॥