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Rigveda / 6 / 26 / 3

त्वं क॒विं चो॑दयो॒ऽर्कसा॑तौ॒ त्वं कुत्सा॑य॒ शुष्णं॑ दा॒शुषे॑ वर्क्। त्वं शिरो॑ अम॒र्मणः॒ परा॑हन्नतिथि॒ग्वाय॒ शंस्यं॑ करि॒ष्यन् ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 26 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। क॒विम्। चो॒द॒यः॒। अ॒र्कऽसा॑तौ। त्वम्। कुत्सा॑य। शुष्ण॑म्। दा॒शुषे॑। व॒र्क्। त्वम्। शिरः॑। अ॒म॒र्मणः॑। परा॑। अ॒ह॒न्। अ॒ति॒थि॒ऽग्वाय॑। शंस्य॑म्। क॒रि॒ष्यन् ॥३॥

पदार्थ : हे तेजस्विराजन् ! (त्वम्) आप (अर्कसातौ) अन्न आदि के विभाग में (कविम्) विद्वान् की (चोदयः) प्रेरणा करिये और (त्वम्) आप (कुत्साय) वज्र के लिये और (दाशुषे) दान करनेवाले के लिये (शुष्णम्) बल को (वर्क्) काटते हो और (त्वम्) आप (अमर्मणः) नहीं विद्यमान मर्म जिसमें उसके (शिरः) शिर को (परा, अहन्) दूर करिये और (अतिथिग्वाय) अतिथियों को प्राप्त होनेवाले के लिये (शंस्यम्) प्रशंसा करने योग्य कर्म को (करिष्यन्) करते हुए वर्तमान हो, इससे आप सत्कार करने योग्य हो ॥३॥

भावार्थ : राजा विद्या और विनय आदि श्रेष्ठ गुणों से युक्त जनों को राजकार्यों में युक्त करे और उन्नति को करता हुआ विद्या आदि का दाता होकर प्रशंसा को प्राप्त होवे ॥३॥