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Rigveda / 6 / 44 / 4

त्यमु॑ वो॒ अप्र॑हणं गृणी॒षे शव॑स॒स्पति॑म्। इन्द्रं॑ विश्वा॒साहं॒ नरं॒ मंहि॑ष्ठं वि॒श्वच॑र्षणिम् ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 44 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर मनुष्यों को किसकी स्तुति करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्यम्। ऊँ॒ इति॑। वः॒। अप्र॑ऽहनम्। गृ॒णी॒षे। शव॑सः। पति॑म्। इन्द्र॑म्। वि॒श्व॒ऽसह॑म्। नर॑म्। मंहि॑ष्ठम्। वि॒श्वऽच॑र्षणिम् ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! मैं (वः) आप लोगों और (त्यम्) उसको (उ) वितर्कपूर्वक (अप्रहणम्) अन्याय से नहीं किसी को मारनेवाले (शवसः) सेना के (पतिम्) स्वामी (विश्वासाहम्) सम्पूर्ण शत्रुओं की सेनाओं को सहनेवाले (मंहिष्ठम्) अत्यन्त महान् और (विश्वचर्षणिम्) धार्मिक मनुष्य काम देखनेवाले जिसके उस (नरम्) अग्रणी (इन्द्रम्) दुष्टाचारी शत्रुओं के विनाशक मनुष्य की (गृणीषे) प्रशंसा करता हूँ, जिसकी आप स्तुति करते हो ॥४॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! आप लोगों को उसकी प्रशंसा करनी चाहिये जो नित्य न्यायकारी, सबका सहनेवाला, महाशय, युद्ध आदि राजकर्म्मों में निपुण, दुष्टों का विदारक, दृढ़ उत्साही, मनुष्य होवे ॥४॥