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Rigveda / 6 / 44 / 5

यं व॒र्धय॒न्तीद्गिरः॒ पतिं॑ तु॒रस्य॒ राध॑सः। तमिन्न्व॑स्य॒ रोद॑सी दे॒वी शुष्मं॑ सपर्यतः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 44 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराडुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यम्। व॒र्धय॑न्ति। इत्। गिरः॑। पति॑म्। तु॒रस्य॑। राध॑सः। तम्। इत्। नु। अ॒स्य॒। रोद॑सी॒ इति॑। दे॒वी इति॑। शुष्म॑म्। स॒प॒र्य॒तः॒ ॥५॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यम्) जिस (तुरस्य) दुःख के नाश करनेवाले (राधसः) धन के (पतिम्) स्वामी, ऐश्वर्य्य से युक्त को (इत्) ही (गिरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियाँ (वर्धयन्ति) बढ़ाती हैं और (अस्य) इसके (देवी) सुन्दर प्रकाशमान (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी (शुष्मम्) बल का (नु) शीघ्र (सपर्यतः) सेवन करते हैं (तम्, इत्) उसी की आप लोग वृद्धि करके सेवा करो ॥५॥

भावार्थ : जो मनुष्य श्रेष्ठ गुण, कर्म्म और स्वभावों में वृद्धि को प्राप्त जन की वृद्धि करते हैं, वे पञ्चतत्त्वमय राज्य का भोग करते हैं ॥५॥