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Rigveda / 6 / 44 / 6

तद्व॑ उ॒क्थस्य॑ ब॒र्हणेन्द्रा॑योपस्तृणी॒षणि॑। विपो॒ न यस्यो॒तयो॒ वि यद्रोह॑न्ति स॒क्षितः॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 44 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आसुरीपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : तत्। वः॒। उ॒क्थस्य॑। ब॒र्हणा॑। इन्द्रा॑य। उ॒प॒ऽस्तृ॒णी॒षणि॑। विपः॑। न। यस्य॑। ऊ॒तयः॑। वि। यत्। रोह॑न्ति। स॒ऽक्षितः॑ ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यस्य) जिसके (सक्षितः) तुल्य निवास और (ऊतयः) रक्षण आदि कर्म (विपः) बुद्धिमान् जन (न) जैसे वैसे (यत्) जिसको (वि) विशेष करके (रोहन्ति) जमाते हैं (तत्) उसको (वः) आप लोगों के (उक्थस्य) प्रशंसित कर्म्म के (बर्हणा) बढ़ाने से (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के लिये (उपस्तृणीषणि) ढाँपने योग्य को हम लोग बढ़ावें ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो विद्वानों के सदृश प्रजा के रक्षण से ऐश्वर्य्य को बढ़ाते हैं, वे सब प्रकार से बढ़ते हैं ॥६॥