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Rigveda / 6 / 63 / 8

पु॒रु हि वां॑ पुरुभुजा दे॒ष्णं धे॒नुं न॒ इषं॑ पिन्वत॒मस॑क्राम्। स्तुत॑श्च वां माध्वी सुष्टु॒तिश्च॒ रसा॑श्च॒ ये वा॒मनु॑ रा॒तिमग्म॑न् ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 63 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर राजा और प्रजाजन कैसे वर्त्ताव कर क्या पावें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : पु॒रु। हि। वा॒म्। पु॒रु॒ऽभु॒जा॒। दे॒ष्णम्। धे॒नुम्। नः॒। इष॑म्। पि॒न्व॒त॒म्। अस॑क्राम्। स्तुतः॑। च॒। वा॒म्। मा॒ध्वी॒ इति॑। सु॒ऽस्तु॒तिः। च॒। रसाः॑। च॒। ये। वा॒म्। अनु॑। रा॒तिम्। अग्म॑न् ॥८॥

पदार्थ : हे (पुरुभुजा) बहुतों की पालना करनेवालो ! (वाम्) तुम दोनों (नः) हमारे लिये (पुरु) बहुत (देष्णम्) देने योग्य पदार्थ (धेनुम्) वाणी और (असक्राम्) सहन को उल्लङ्घन करनेवाला (इषम्, च) अन्न वा विज्ञान को भी (पिन्वतम्) सुखयुक्त करो अर्थात् पुष्ट करो। जो (हि) निश्चित (स्तुतः) प्रशंसा को प्राप्त है (च) वह भी (वाम्) तुम दोनों को पुष्टि दे (ये) जो (वाम्) तुम दोनों के (माध्वी) माधुर्य्यादिगुणयुक्त (सुष्टुतिः) श्रेष्ठ प्रशंसा (रसाः, च) और रस हैं उनसे (रातिम्) दान को (अनु, अग्मन्) प्राप्त होते हैं, उनसे हमको युक्त कराइये ॥८॥

भावार्थ : जो राजा और प्रजाजन परस्पर के उपकार के लिये प्रयत्न करें तो इनको सर्व प्रशंसा और सकल ऐश्वर्य भी प्राप्त होवे ॥८॥