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Rigveda / 6 / 63 / 9

उ॒त म॑ ऋ॒ज्रे पुर॑यस्य र॒घ्वी सु॑मी॒ळ्हे श॒तं पे॑रु॒के च॑ प॒क्वा। शा॒ण्डो दा॑द्धिर॒णिनः॒ स्मद्दि॑ष्टी॒न्दश॑ व॒शासो॑ अभि॒षाच॑ ऋ॒ष्वान् ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 63 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒त। मे॒। ऋ॒ज्रे इति॑। पुर॑यस्य। र॒घ्वी इति॑। सु॒ऽमी॒ळ्हे। श॒तम्। पे॒रु॒के। च॒। प॒क्वा। शा॒ण्डः। दा॒त्। हि॒र॒णिनः॑। स्मत्ऽदि॑ष्टीन्। दश॑। व॒शासः॑। अ॒भि॒ऽसाचः॑। ऋ॒ष्वान् ॥९॥

पदार्थ : जो मनुष्य (अभिषाचः) सम्मुख सम्बन्ध करते वा (वशासः) वश को प्राप्त होते हैं तथा (पुरयस्य) जो पहिले प्राप्त होता उस (मे) मेरे (ऋज्रे) कोमलता से प्रिय (सुमीळ्हे) सुन्दर सेचने योग्य (उत) और (पेरुके) पालन करनेवाले व्यवहार में (रघ्वी) छोटी क्रिया (पक्वा, च) और पके फलों को (शाण्डः) सूक्ष्मता करनेवाला (दात्) देता है उन (हिरणिनः) हिरणवाले (स्मद्दिष्टीन्) प्रशंसित दर्शनवाले (ऋष्वान्) बड़े-बड़े (दश) दश घोड़े वा रथों को वा (शतम्) और सैकड़ों को मैं प्राप्त होऊँ ॥९॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो मेरे वशीभूत, प्रीतियुक्त, महान् सहायक होते हैं, उनके आधीन मैं भी होऊँ, इस प्रकार परस्पर का वशभाव हुए पीछे उत्तम असङ्ख्य कार्य्य कर सकूँ ॥९॥